परिशिष्ट ५९३ प्रतिष्ठित होनेका सौभाग्य प्राप्त है और जिनपर सभी परस्पर जूझते समुदायोंको पूरा भरोसा है और सरकार भी जिनका आदर करती है और जिनसे भय खाती है । आपके ये देशवासी किसी भी तरहसे अपनी भावनायें व्यक्त नहीं कर पाते। वे आपसे इसलिए अपील करते हैं कि आपने अपने आपको आत्मत्यागके जिस अनुशासनसे कस लिया है उसका वे सम्मान करते हैं । श्रीमान, आप इसे हमारी धृष्टता न मानें कि हम इस प्रकार उस मूक जनताके प्रतिनिधि बनकर आपके सामने आये हैं और आपसे उस बागडोरको फिर थामनेका अनुरोध कर रहे हैं, जिसे आपने स्वेच्छासे त्याग दिया था । हमें अनुमति दीजिए कि हम आपसे यह अपील कर सकें, भारतकी मूक जनताके नामपर उन लोगोंकी दुहाई देकर जिन्होंने आपके मार्ग-दर्शनके कालमें बिना किसी आनाकानी या शंकाके आपके आदेशोंका पालन किया था; अनुमति दीजिए कि हम स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्वके उन पवित्र सिद्धान्तोंके नामपर आपसे अपील कर सकें जिनको आज सिर्फ इसलिए पैरों तले रौंदा जा रहा है कि निराशा और विपत्तिके इन दुदिनोंमें भी अपना मस्तक ऊँचा रख सकने और प्रतिक्रियावादके थपेड़ोंका मुँह मोड़ सकनेवाला जो एकमात्र व्यक्ति है, वही आज एक ओर अलग खड़ा है । श्रीमान, यह अपील करनेके हमारे पास जो कारण मौजूद हैं उनसे आप परिचित नहीं हो सकते। आपने जबसे अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलनका सूत्रपात किया है, हम तब ही से आपके अनुयायी रहे हैं; और शासनकी वर्तमान व्यवस्थाके विरुद्ध आपके संघर्ष के बुनियादी सिद्धान्तों परसे हमारा विश्वास अभी उठ नहीं गया है। आपके महान आदर्श के पालनेके लिए जिस कठोर आत्मानुशासन, अडिग आत्मत्यागकी आवश्यकता थी, उसके लिए देश शायद तैयार नहीं था । अपने देशवासियोंकी अप्रस्तुत मनःस्थिति देखकर आपको घोर निराशा हुई और इसीलिए, आपने अकथनीय मानसिक पीड़ाके बावजूद यह फैसला कर लिया था कि चौरी-चौरा काण्डकी अनगिनत बार पुनरावृत्ति कराते हुए आगे बढ़नेसे तो कहीं अच्छा है कि बारडोलीसे आरम्भ हुए आन्दोलनको ही रद कर दिया जाये । श्रीमान, आपकी जेल-यात्राके साथ ही राष्ट्रीय एकताकी उग्र भावना और राष्ट्रीय स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके दृढ़ संकल्पका ह्रास शुरू हो गया। आपकी रिहाई और उसके बादकी राजनीतिक घटनाओंकी सभीको बड़ी अच्छी जानकारी है, इसलिए उनको यहाँ दोहरानेकी जरूरत नहीं। लेकिन सकतेमें पड़ा राष्ट्र साँस रोककर प्रति- क्रियावादी शक्तियोंको एकके बाद दूसरी विजय प्राप्त करते देखता आ रहा है; उसे लग रहा है कि आप देशको असाध्य अनौचित्यके अतल कूपमें गिरनेसे बचानेके लिए एकके बाद एक आत्मसमर्पण करते जा रहे हैं। ऐसे भी अनेक व्यक्ति हैं जो आपके उस उदात्त आत्माको कभी समझ ही नहीं पाये, जिसने जेलसे आपकी बिना शर्त रिहाईके दिनसे ही आपकी सभी गतिविधियोंको प्रेरित किया है। लेकिन कहते हैं कि अब वह घड़ी आ पहुँची है जब आप अपनी मातृभूमिके प्रति अपने अपार प्रेमकी खातिर एक और बड़ा त्याग करें, अबतक आपने जितने त्याग किये हैं उनसे कहीं बड़ा एक त्याग और करें, अर्थात् आप अपने लिए हुए व्रतको त्याग दें। और हमारे इस उद्गारके पीछे केवल हमारी अपनी ही भावना नहीं है बल्कि उक्त शंकालु और ढुलमुल ३१-३८ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६२९
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