मान्यवर, परिशिष्ट ६ बनारसीदास चतुर्वेदीका पत्र - फीरोजाबाद, आगरा ९ सितम्बरके 'यंग इंडिया' में 'आउट ऑफ द फ्राइंग पेन' शीर्षकसे प्रकाशित आपके लेखमें कुछ बातें कही गई हैं, जिनका स्पष्टीकरण आपसे अपेक्षित है । आपने आई० आई० सी० एसोसिएशनके श्री वेजके प्रतिवेदनका एक अंश उद्धृत किया है, जिसमें इस बातको जोर देकर कहा गया है कि उपनिवेशोंमें बसे भारतीयोंने दो कारणोंसे अपना जन्मप्रदेश त्याग था (१) मातृभूमि जानेकी इच्छा और (२) यह अफ- वाह कि भारतको स्वराज्य मिल गया है। वापस आये इन प्रवासियोंके सम्पर्कमें में पिछले छः वर्षोंसे हूँ । इस अरसेमें और नहीं तो बीस बार अवश्य ही उनके घरोंमें जाकर उनसे मिला हूँ । इन नाते मैं कह सकता हूँ कि यह दूसरा कारण एक कोरी कल्पना है । श्री एन्ड्रयूज और आपने जब मुझे इन प्रवासियोंकी देखभालका काम सौंपा था, उस समय भी एक-दो लोगोंने मुझे यह कारण बतलाया था और मैंने इस सम्बन्धमें पूरी तरहसे जाँच-पड़ताल की थी और इसे बिलकुल ही निराधार पाया था। जाहिर है कि मटियाबुर्जके कुछ चतुर लोगोंने श्री वेजको भटका दिया होगा । 6 भारत लौटे हुए इन प्रवासियोंकी कठिनाइयोंका जिक्र करते हुए आपने लिखा है : " यहाँ वे सामाजिक रूपसे बहिष्कृत जैसे हैं, क्योंकि वे जनताकी भाषातक नहीं जानते । " सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि अधिकांश प्रवासी जनताकी भाषा जानते हैं । निश्चय ही, वे अपना आशय व्यक्त कर सकते हैं, यह दूसरी बात है कि उनकी हिन्दुस्तानी व्याकरणकी दृष्टिसे शुद्ध नहीं होती। मैंने खुद ही मटियाबुर्ज में सैकड़ों प्रवासियोंसे हिन्दीमें बातचीत की है। में इतनी बार मटियाबुर्ज गया हूँ, पर मुझे वहाँ एक भी भारतीय ऐसा नहीं मिला जिसके बारेमें आपका यह कथन बिलकुल सही उतरता हो कि " वे जनताकी भाषातक नहीं जानते ।" मैं निश्चित तौरपर कह सकता हूँ कि उनमें से अधिकांशको बोलचालकी हिन्दुस्तानीकी अच्छी जानकारी है । हाँ, वे साहित्यिक हिन्दी या उर्दू नहीं जानते । एक चीज और है जिसे भूलनान हीं चाहिए। वह यह कि लौटे हुए भारतीयोंमें से अस्सी प्रतिशत भारतके गाँवोंमें घुलमिल जाते हैं, और केवल बीस प्रतिशतसे कुछ कमको ही मटियाबुर्जमें शरण लेनी पड़ती है । मटियाबुर्जमें टिके इन लोगोंको बसने- के अवसर कई बार दिये गये, पर वे हर बार मना करते रहे हैं। इसमें शक नहीं कि मटियाबुर्ज में इस समय टिके इन प्रवासियोंमें से अनेक अपनी जातिके लोगों, जमींदारों और पुलिस तथा पण्डितोंके अत्याचारोंसे पीड़ित रह चुके हैं, पर ये लोग लौटे हुए Gandhi Heritage Portal
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