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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३५

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परिशिष्ट ५९९ प्रवासियोंकी कुल संख्याका एक बहुत ही छोटा भाग हैं। इसलिए आपके कथनमें कुछ तरमीम जरूरी हो जाती है । लौटे हुए इन प्रवासियोंको आप किसी ऐसे सर्वाधिक उपयुक्त उपनिवेशमें भेजने की नीतिका अनुमोदन करते हैं, जो इन्हें स्वीकार करने को तैयार हो । अभी इस समय तो ब्रिटिश गियाना ही इनको स्वीकार करनेके लिए तैयार है और भारत सरकार इनमें से कुछको वहाँ भेजने के लिए तैयार भी है। और सचमुच कलकत्तामें एक स्टीमर पिछले कुछ दिनोंसे इनका इन्तजार भी कर रहा है। वह २० तारीखको चलेगा। क्या आप फिजीके भारतीयोंको ब्रिटिश गियाना भेजनेकी नीतिका अनुमोदन करते हैं? में यह प्रश्न इसलिए पूछ रहा हूँ कि मुझे आशंका है कि कहीं भारत सरकार आपके इस बयानकी आड़ लेकर फिजीके भारतीयोंको ब्रिटिश गियाना न भेज दे। इस समय मटियाबुर्ज में ब्रिटिश गियानासे लौटे प्रवासियोंकी संख्या ३०० से अधिक नहीं है जबकि फिजीसे लौटे प्रवासी ६०० से अधिक मौजूद हैं। मैंने दस महीने पहले मटियाबुर्ज में जाँच की थी और इलाहाबादसे निकलनेवाले 'चाँद' में अपने निष्कर्ष प्रकाशित कराये थे । मेरे इस लेखके कुछ अंश फिजी विधान परिषदके एक सदस्यने परिषदकी बैठकमें पढ़कर सुनाये थे और उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया था कि फिजीके इन ५०० लोगोंको फिजी बुला लिया जाये । प्रस्ताव स्वीकृत हो गया था और उसे परिषदके सदस्योंकी सर्वसम्मत राय मान लिया गया था। अब फिजीके गवर्नरने इस विषयको लेकर उपनिवेश-सचिवको लिखा है । इसलिए सम्भव है कि फिजीसे लौटे ये प्रवासी शायद फीजी वापस भेजे जा सकें । मटियाबुर्ज में टिके प्रवासियोंकी इस समस्याके सम्बन्धमें आपने चार बुनियादी सवाल उठाये हैं: (१) प्रवास-नीति (२) ब्रिटिश गियाना और फिजीकी विशेष स्थिति (३) मैत्रीपूर्ण संस्थाओंके कामकी मर्यादा और (४) राष्ट्रका कर्त्तव्य । आपका कहना है कि कलकत्तामें ठहरे हुए प्रवासियोंकी अविलम्ब सहायताकी जानी चाहिए। और ब्रिटिश गियानासे लौटे प्रवासियोंको वहीं वापस भेजनेकी आपकी बातसे तो मैं बिलकुल सहमत हूँ, पर फीजीके भारतीयोंको ब्रिटिश गियाना भेजनेकी सलाह में नहीं दे सकता, क्योंकि उसका जलवायु फीजीके मुकाबले बहुत ही खराब है। फिजीका जलवायु बड़ा अच्छा है । आपने जो चार प्रश्न उठाये हैं वे वास्तवमें परस्पर गुँथे हुए हैं और उनकी ओर तुरन्त ध्यान देना आवश्यक है । भारत सरकारके पत्रसे स्पष्ट है कि वह ब्रिटिश गियाना भेजनेके लिए ५०० परिवार भर्ती करना चाहती है । इसके अतिरिक्त अन्य उपनिवेशोंसे भी प्रतिवर्ष हजारों भारतीय लौटते रहते हैं और मटियाबुर्जकी समस्या निस्सन्देह अस्थायी नहीं है, अभी लम्बे अरसेतक वह बार-बार सामने आती रहेगी । हमें यह भी याद रखना चाहिए । औपनिवेशिक सरकारें एक शरारत करती रही हैं - वे उनके कागजात भारत भेजती रही हैं। ये अभागे लोग उपनिवेशोंमें अपने जीवनका सबसे अच्छा क्रियाशील समय बिताकर जब भारत लौटते हैं तो नैतिक और शारीरिक दोनों ही तरहसे बिलकुल बुझ चुके होते हैं और ऐसे लोग उपनिवेशोंके लिए किसी भी तरह लाभप्रद निवासी नहीं हो सकते। हमें मालूम Gandhi Heritage Portal