६०० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय है कि दो वर्षसे कुछ अधिक समय पहले इन लोगोंको एक बड़ी संख्या में मॉरिशस भेजा गया था और उनमें से अधिकांशको मॉरिशस सरकारने अपने खर्चपर भारत लौटा दिया था । इन लोगोंको फौरन मदद पहुँचानेकी चिन्तामें हमें प्रश्नका यह पहलू अनदेखा नहीं कर देना चाहिए कि इनमें से कितने लोग उपनिवेशोंमें किसी कामके सिद्ध होंगे। हमारे कर्त्तव्यको इतिश्री इतनेपर ही नहीं हो जाती कि जल्दीसे-जल्दी इनको किसी भी उपनिवेशमें भेज दिया जाये । आवश्यकता इस बातकी है कि इसमें दिलचस्पी रखने और इनके लिए कुछ कर सकनेवाले सभी लोग इस पूरे प्रश्नपर बारीकीसे बहस-मुबाहिसा करें। ऐसा करने और कुछ सामान्य निष्कर्ष निकाल लेनेके बाद ही फिर सरकारसे उसका कर्त्तव्य पूरा करनेकी अपेक्षा की जा सकेगी। ऐसा बहस-मुबाहिसा शुरू करनेसे पहले इस बातकी गहरी जाँच-पड़ताल कर लेना जरूरी है कि ये लौटे हुए प्रवासी मटियाबुर्ज जानेसे पहले विभिन्न जिलोंमें किन परिस्थितियोंमें रहते थे । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २३-९-१९२६ आपका इत्यादि, बनारसीदास चतुर्वेदी परिशिष्ट ७ रोमाँ रोलाँका पत्र मीराबहनके नाम ' विलन्व (वाँ) विला ओल्गा २६ सितम्बर, १९२६ प्रिय वहन, तुमसे, और इस बहाने तुम्हारे बापूसे, बात करनेके लिए एक घण्टा मैंने आखिर निकाल ही लिया । मैं तुम्हारे आखीर जुलाईके खतका जवाब दे रहा हूँ और में एक बार फिर इस बातपर अफसोस जाहिर करता हूँ कि गांधी हैल्सिगफोर्समें हुए ईसाई युवकोंके सम्मेलनमें शामिल नहीं हो पाये। इनमेंसे कई युवकों और खासकर के० टी० पॉलसे अपनी मुलाकातके बादसे तो मेरा अफसोस और भी गहरा हो गया है । तुम सोचती हो कि गांधीके व्यक्तित्वके प्रति अपना लगाव दिखाना एक फैशनसा बन गया है, या यह कि गांधीके सिद्धान्तके प्रति एक ऊपरी या सतही आसक्ति है । ऐसी कोई बात नहीं है; बिलकुल नहीं। इसका कोई सवाल ही नहीं १. इसका अनुवाद मूल फ्रेन्चसे अंग्रेजीमें मीराबहन द्वारा किए गए अनुवादसे किया गया है। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३६
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