परिशिष्ट ६०१ उठता, लेकिन सच्चाई इससे अधिक अप्रत्याशित, पर निर्विवाद है और वह यह है कि यूरोपकी ईसाइयतको गांधीका व्यक्तित्व, उनका कर्म, उनका जीवनका तरीका और उनकी आस्था ही सबसे अधिक प्रेरणा देती रही है। ऐसी आशा न तुमको थी और न गांधीको ही; और महात्मा ऐसा कोई लक्ष्य लेकर चले भी नहीं थे । परन्तु महान कार्योंके परिणाम अप्रत्याशित निकलते हैं, और अक्सर ऐसा होता है कि उनके प्रभावका महत्त्व ईश्वरका काम करनेवाले इन महान व्यक्तियोंकी अपनी आशा और इच्छासे मेल खाता हुआ या उससे भी कहीं अधिक हो जाता है । इसलिए कि आखिर व्यक्ति ही तो कर्म नहीं करता, कर्त्ता तो ईश्वर ही है जो व्यक्तिके माध्यम से कर्म करता है । सच तो यह है कि यूरोपके ईसाइयोंकी नई पीढ़ीने गांधीमें आजके विशुद्धतम ईसाईके दर्शन किये हैं (भले ही गांधीको इसकी जानकारी न हो) ऐसे इन्सानके दर्शन किये हैं जो धर्माचार्यों और पादरियोंसे कहीं ऊपर उठकर ईसाके धर्मोपदेशोंकी भावनाको लेकर चलनेवाली परम्परासे प्रत्यक्ष तादात्म्य स्थापित करता है । इस प्रकार ईसाइयोंके समक्ष उनके अपने धर्म-सिद्धान्तोंकी व्याख्या करने और समझाने और पीड़ाजनक आशंकाओं तथा अनिश्चयकी घड़ीमें उनका सही मार्गदर्शन करनेके कारण इन तरुण ईसाइयोंपर गांधीका प्रभाव अत्यधिक व्यापक हो गया है । बहुत मुमकिन है कि गांधीकी अपनी कोई ऐसी अभिलाषा न रही हो । लेकिन मैं फिर कहूँगा कि ऊपरवाला, जो गांधीसे कहीं बड़ा है, उसकी यही इच्छा थी । और गांधी को भविष्यमें उसकी इस इच्छासे बच निकलनेका कोई अधिकार नहीं । इसलिए कि भारतमें उसका काम कितना ही अनुल्लंघनीय या अनिवार्य क्यों न हो, पर वह काम समूची मानवताके प्रति उसके कर्त्तव्यका एक अंग ही है और वह कर्त्तव्य उससे कहीं बड़ा है । और हिन्दूधर्ममें गांधीका अपना व्यक्तिगत विश्वास कितना ही गहरा क्यों न हो, लेकिन सारे धार्मिक विश्वासों में सर्वश्रेष्ठ दिव्यतम विश्वासज्ञानका प्रचण्डतम आलोक, एक शाश्वत, चिरंतन तत्त्व वही है जो सभी धार्मिक विश्वासों में समान रूपसे व्याप्त है, वह नहीं जो ईश्वरको किसी वस्तु विशेष या स्थल विशेष में ही देखता है और उसे हर कहीं समान रूपसे व्याप्त, सर्वव्यापक नहीं मानता । और जो ईश्वरकी वाणी सुनता है और ईश्वरके शब्दोंको ही दोहराता है वह संसार के समस्त प्राणियोंके उद्गारोंको वाणी देता है । अन्तःकरण और आस्थाकी समस्याका कोई हल तलाश न कर पानेकी दारुण व्यथा अब वर्तमान ईसाई समाज में घुन लगाती जा रही है । ईसाइयोंका कोई भी धर्माचार्य या धर्म-प्रवक्ता इस समस्याको हल करने में समर्थ नहीं है। इसकी एक बड़ी तीव्र अभिव्यंजना मैंने रोम विश्वविद्यालयके एक प्राध्यापककी रचनाओंमें देखी है। लुइगी त्राफेलीकी 'उबी क्रिस्टियानुस' और 'डोथिरीना डि क्राइस्टो' ( 'ईसाइयत कहाँ' और 'क्राइस्टका सिद्धान्त' ) दो पुस्तकें मुझे हालमें मिली थीं । निस्सन्देह, लेखकका अन्तःकरण तीव्र व्यथासे विघा हुआ है । वे शुरू ही इस घोषणाके साथ करते हैं कि ईसाने अपने पहले उपदेशमें ही जिस ' मेटानोइया ' या ' आन्तरिक परिवर्तन ' Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६३७
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