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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf/६४०

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६०४ - सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय - - अभी हमारे यहाँ एक बहुत ही खुशमिजाज अमेरिकी आये थे । वे संसारके सभी ख्यातनामा व्यक्तियोंसे मिलनेके लिए एक तूफानी दौरा कर रहे हैं। हर बड़े आदमीके लिए पाँच मिनट ! उनका नाम है- बुकानन । वे सालके शुरूमें गांधीसे मिल चुके हैं, और बतलाते हैं कि गांधीके बारेमें मेरी पुस्तकके सम्बन्धमें गांधीने कहा था : साहित्यकी चीज है ।" नहीं, यह कहना सर्वथा उचित नहीं । कहना चाहिए कि " प्रेमकी चीज है ।" सभी जानते हैं कि प्रेम बिलकुल ही यथार्थ स्वरूपको नहीं देख पाता । मेरी पुस्तकका वर्णन कई जगहोंपर गलत होगा । न भी कैसे होता ? मुझे न भारतके सामाजिक पर्यावरणकी कोई जानकारी थी, न भाषाकी । मैंने तो एक महान जीवनके बारेमें चन्द पुस्तकें पढ़नेके बाद अपनी कल्पनाके बलपर ही छः से बारह महीने में असाधारण कौशलका एक काम कर डाला । पुस्तकें भी ऐसी थीं जो सुदूरके मेरे सर्वथा अपरिचित लोगोंने लिखी थीं। यह एक बहुत ही बड़ी धृष्टता थी । परन्तु प्रेमने मुझे कल्पना न करनेकी और अपने प्रेम-पात्र, अपने आनन्द और अपने उत्साहसे अपने यूरोपीय भाइयोंको वंचित रखनेकी छूट नहीं दी, मुझे विवश कर दिया। और इसमें, मैं समझता हूँ, मैं सफल रहा हूँ। हो सकता है कि कहीं- कहीं, और कई जगहोंपर, गांधीके चरित्र और विचारोंको पेश करनेमें मुझसे चूक हो गई हो। ऐसा सम्भव है और मैं क्षमा चाहता हूँ । पर मैं ऐसी स्थितिमें अकसर अपने-आपसे एक प्रश्न पूछा करता हूँ -- ईसा यदि अपने सम्बन्धमें अपने शिष्यों द्वारा दिये गये वृत्तान्तोंको देखते तो क्या सोचते । सत्य या मिथ्या, जैसा भी हो, पर इतना निश्चित है कि मैंने “साहित्यकी चीज साहित्यकी चीज" नहीं लिखी थी। (साहित्यिक बन्धु मुझे अपनी पंक्तिमें बैठानेके सर्वथा उपयुक्त नहीं मानते । ) मैंने तो जो भी लिखा, अपने हृदयका भार हलका करनेके लिए, अपने उद्गारोंको अभिव्यक्ति देनेके लिए ही लिखा है । हम काफी स्वस्थ हैं, यद्यपि मैं इधर एक पखवारेतक आंत्र ज्वरसे पीड़ित रह चुका हूँ । मेडेलीन अभी कुछ समय के लिए वॉयसे आई थी। साथ-साथ टहलने में बड़ा आनन्द आया । अगस्तसे ही ग्रीष्मकी अपनी निराली एक छटा है। भारतमें तुमको अपना घर जैसा महसूस हो रहा है - इसपर मुझे कोई आश्चर्य नहीं ! क्या तुमने ही नहीं कहा था कि तुम्हारे शरीरमें खानाबदोश 'जिप्सियों' का रक्त है ? तुमने देख लिया; हालकी शोधसे पता चला है कि 'जिप्सी' लोगोंका मूल वास स्थान निश्चय ही भारत था । तुम जहाँसे चली थीं, वहीं लौट गई हो। मेडेलीन और मेरी ओरसे स्नेह । बापूको आदरपूर्ण स्नेह बावजूद इस तथ्यके कि अवस्थामें मैं उनसे बड़ा हूँ, परन्तु आत्माका शरीरसे भिन्न एक अपना काल-चक्र होता है । 7778 तुम्हारा रोमाँ रोलाँ अंग्रेजी अनुवाद (एस० एन० १२१७४) की फोटो - नकलसे । આ अंदाजय बा-१३० Gandhi Ho Portal