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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/१५५

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'गीता-शिक्षण' १२७ वही चीज ले सकता है, जो तुझे में दूं। ऐसा ही ईश्वरने हमें बाँध रखा है। वह कहता है कि तेरी गरज हो तो काम कर, किन्तु फलपर तो मेरा ही अधिकार है । तुझे तो मेरी स्तुति करनी है और स्तुति करनी है कुदाली लेकर काम करते हुए; नदीकी काई साफ करते हुए, अपने आँगनका कूड़ा-करकट हटाते हुए । यह बड़ी कठिन बात कही गई है। गुलाम-मालिकका सम्बन्ध खराब सम्बन्ध है । इनके बीचका सम्बन्ध स्वार्थका सम्बन्ध है । सिंह और बकरेके बीच भी ऐसा ही सम्बन्ध है, किन्तु मनुष्य स्वयं दौड़-भाग करके ईश्वरके मुखमें जा पड़ना चाहता है। ज्ञानी मनुष्य वहाँ ज्ञानपूर्वक जाता है और कहता है : मुझे संसारकी गुलामी नहीं तेरी ही दासता स्वीकार करनी है। ईश्वर उसे अपनेसे जितना-जितना हटाता जान पड़ता है, वह उतना ही उसके अधिक पास जाता है । यह श्लोक इस विचित्र प्रकारके सम्बन्धको वर्णित करनेके लिए दिया गया है। पलकें आँखकी रक्षा करती हैं, किन्तु रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करतीं। वह तो अपने-आप होता रहता है। इसी प्रकार ईश्वर और मनुष्यके बीचका सम्बन्ध स्वाभाविक सम्बन्ध है । मीराबाईने कहा है : " हरिजीने मुझे कच्चे धागेसे बाँध लिया है और वे जिधर खींचते हैं, मैं उधर जाती हूँ ।" इस पदमें वर्णित सम्बन्ध भी हमारे और ईश्वरके बीचका सम्बन्ध है । धागा कच्चा है और तिसपर एक ही है । ' मा कर्मफलहेतुर्भु' कर्मफलका हेतु मत बन । [ अ ] कर्मका [भी] संग मत कर ।' कर्मके भी लालच में मत पड़ । तू यही समझ कि यह सब कुछ में कर रहा हूँ। तू ऐसा क्यों मानता है कि यह सब तू कर रहा है? यदि मारना होगा, तो वह मारेगा। न मारना होगा, तो हाथ पकड़नेवाला भी वही है । [२६] गुरुवार, २५ मार्च, १९२६ - ' मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि मैंने कल इसमें 'अकर्मणि 'की जगह 'कर्मणि' पढ़ा। यह इसलिए हुआ कि मैं सदा ऐसा ही बाँचता आया हूँ । अकर्म अर्थात् जो कर्म तुझे करना चाहिए उसके अतिरिक्त कर्म । इनमें तेरी आसक्ति नहीं होनी चाहिए। तू अकर्मके प्रति आसक्ति मत रख । योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय । सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ (२,४८) संग [ आसक्ति ] को छोड़कर योगस्थ होकर कर्म कर । योग अर्थात् कर्मफलका त्याग । योग अर्थात् जो अकर्म है उसके फलकी इच्छा न रखना। हम किसी भी वस्तुके प्रति ममता रखकर काम न करें। क्या अच्छे कामके प्रति आसक्ति भी खराब है ? हाँ । स्वराज्य प्राप्त करनेके विषयमें आसक्ति हो तो हम अशुद्ध साधनोंका उपयोग १. देखिए अगली तिथिमें पहली पंक्ति । २. अधिकांश टीकाकार इसका यह अर्थ करते हैं कि तू कर्मोंको छोड़नेके प्रति भी आसक्त मत हो । Gandhi Heritage Portal