________________
२८८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय किरीटनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते । (११, ४६) मैं आपके उस रूपका दर्शन करना चाहता हूँ जो मुकुटधारी, गदाधारी और चक्रधारी है। हे सहस्रबाहु, हे विश्वमूर्ति, आप अपना चतुर्भुज रूप धारण करें। मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दशितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ।। (११, ४७) हे अर्जुन, तुझपर प्रसन्न होकर ही मैंने आत्मशक्तिके द्वारा यह तेजस्वी तथा परम आदि, अनन्त विश्व-रूप दिखाया है । तेरे सिवाय आजतक किसी दूसरेने यह रूप नहीं देखा । न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दाने- न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रेः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ (११, ४८) 'वेद' के अध्ययन, यज्ञ, दान और अनेक प्रकारकी क्रियाओं, उग्र तपस्यासे भी मेरा यह रूप देख सकनेमें, हे अर्जुन, तेरे सिवाय कोई समर्थ नहीं है । मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ।। (११, ४९) मेरे इस भयंकर रूपको देखकर तू व्यथित मत हो । यह तुझे मूढ़ भी न बनाये । भय छोड़कर तू प्रसन्न हो और मेरे परिचित रूपको देख । [ १५४] गुरुवार, ९ सितम्बर, १९२६ वृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ (११, ५१ ) तब अर्जुनने कहा कि हे जनार्दन, आपके सौम्य मनुष्य स्वरूपको देखकर मेरी चेतना लौट आई है । १. साधन-सूत्र में इसके बादका संजय द्वारा कहा गया श्लोक छोड़ दिया गया है। Gandhi Heritage Portal