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२९० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय अध्याय १२ [ १५५ ]' शुक्रवार, १० सितम्बर, १९२६ एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ ( १२,१) ईश्वरके प्रति प्रेम रखनेका अर्थ है अन्य किसी काममें आसक्ति न रखना । काम तो करना है परन्तु ममत्वभावके बिना, ईश्वरके लिए ही । कामी मनुष्य अपनी वासनाओंको पूरा करनेके लिए अपने माता-पिता और बच्चोंकी आसक्ति छोड़कर, वासनामें ही डूब जाता है । यह भी अनासक्ति है । किन्तु यह तल्लीनता एक खराब कामके प्रति है, जबकि ईश्वरके प्रति प्रेम सद्गुण है । अब श्लोकका अर्थ लें : उपर्युक्त रीतिसे जो भक्त हमेशा आपके साथ युक्त होकर एकाग्र चित्तसे समाधिस्थ रहता है और जो आपको अक्षर और अव्यक्त मानता हुआ आपकी उपासना करता है, इन दोनोंमें श्रेष्ठ कौन है ? मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ (१२,२) भगवान उत्तर देते हैं : जो मनुष्य सदा मुझमें अपनेको लीन करके, परम श्रद्धा, अचल श्रद्धाके साथ मेरी उपासना करता है, में उसे श्रेष्ठ योगी कहता हूँ । ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ (१२, ३-४) किन्तु जो पुरुष समस्त इन्द्रियोंके समुदायको अच्छी तरह वशमें करके सबके प्रति समत्व दृष्टि रखकर, मेरे दृढ़, अचल, ध्रुव, अचिन्त्य, सर्वव्यापी, अव्यक्त, अवर्ण- नीय और अविनाशी स्वरूपकी उपासना करता है, वह सब प्राणियोंके हितमें रत रहकर मुझे ही प्राप्त करता है । [ १५६] शनिवार, ११ सितम्बर, १९२६ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते । (१२,५) जिनका चित्त अव्यक्तमें लगा हुआ है अर्थात् जो निर्गुण ब्रह्मकी उपासना करते हैं, उन्हें अधिक क्लेश होता है । क्योंकि हम शरीरधारी जीवोंका अव्यक्तकी गतिको जानना अति कठिन है । १. शुक्रवार और शनिवारका विवरण महादेवभाईने नहीं लिखा था । Gandhi Heritage Portal