क्या यह जीवदया है ? - ५ एक स्थानपर इकट्ठा कर लिया जायेगा। यह उपाय एक बार ही करना होगा । आवारा कुत्ते कोई आकाशसे नहीं उतरते हैं। वे समाजके आलस्यकी, शिथिलताकी, अज्ञानकी निशानी हैं। उनके उपद्रवका कारण ज्ञान और दयाका अभाव है । यदि कोई आवारा कुत्तेको रोटी नहीं दे तो वह भाग जायेगा । मैंने जो उपाय सुझाया है उसमें यद्यपि समाजका स्वार्थ अवश्य है तथापि उसमें कुत्तोंकी भलाईका विचार भी है। कोई भी प्राणी आवारा न रहे, ऐसी इच्छा करना और इस दिशामें प्रयत्न करना दयाधर्मीका धर्म है। उसके पालनके लिए किसी-किसी अवसरपर कुत्तोंका वध आवश्यक हो सकता है । दूसरा प्रश्न यह है : जब-जब कुत्तोंका उपद्रव हो तब-तब वे मनुष्यके हाथों मरेंगे, यह बात तो ठीक है। लेकिन आप तो यह भी कहते हैं कि वे पागल हों, तबतक राह देखने में दयाभाव नहीं है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि चूंकि प्रत्येक कुत्ता भविष्य में पागल होनेवाला ही है इसलिए सावधानीकी खातिर उन्हें उनकी अच्छी हालत में हो मार डालना चाहिए। इसके बारेमें आश्रम में रहनेवाले एक मित्रसे मेरी बातचीत हुई है। उन्होंने आपसे पूछा था; और सुना है आपने उनसे यह कहा कि कुत्तोंको देखते ही उन्हें ढूंढ-ढूंढकर मारनेकी बात में नहीं कहता, लेकिन जब वे मनुष्य जीवनके लिए संकटका कारण बन जायें और उसके निवारणका अन्य कोई उपाय न हो तभी अन्तिम उपाय अनिवार्य होगा । अनिवार्य होगा, ऐसा भी आप नहीं कहते । आपके लेखोंसे ऐसा अर्थ आसानी से नहीं निकलता और तोड़-मरोड़कर निकालनेमें भी कठिनाई मालूम होती है। तो क्या आप इसके सम्बन्धमें अधिक स्पष्टीकरण नहीं करना चाहेंगे ? मेरे पहलेके लेखों और उपर्युक्त उत्तरके बाद इसके विशेष स्पष्टीकरणकी आवश्यकता नहीं रह जाती । हाँ, कुत्तेके पागल होनेकी राह नहीं देखी जा सकती अपनी यह बात मुझे स्पष्ट करनी चाहिए। हर आवारा कुत्ता हानिका कारण है । यह उपद्रव शहरोंमें ही होता है और यह बन्द होना चाहिए । हम सर्पके काटनेकी राह नहीं देखते। कुत्ता काटता है. - इसीमें उसके पागल होनेकी बात छिपी हुई है । एक मित्र ने मुझे पागल कुत्तोंके शिकार रोगियोंके आँकड़े भेजे हैं। ये आँकड़े अहमदाबादके सिविल अस्पतालमें कुत्तोंके काटे हुए रोगियोंके हैं। ऐसे तो अन्य अनेक रोगी होंगे जो वहाँ आये ही न हों । - अवधि शहरोंके रोगियोंकी संख्या अन्य रोगियोंको कुल संख्या १९२५ १९४ संख्या ९२३ १११७ (जनवरीसे दिसम्बर) १९२६ २९५ ६९५ ९९० (जनवरीसे सितम्बर) Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/४१
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