२५३. पत्र : डाह्याभाई मनोरदास पटेलको यात्रामें [ १६ जनवरी, १९२७ ॥ भाईश्री डाह्याभाई, तुम्हारा पत्र मिला। इसमें कोई सन्देह नहीं कि किसानों की स्थिति फिलहाल खराब होती जा रही है। लेकिन इसके कारण तुम जो सोचते हो उससे कहीं ज्यादा गहरे हैं । अधीर होने से काम बिगड़ता है । रोष करने से सुधरता नहीं है । उपाय सरकारके हाथ में नहीं अपितु किसानोंके हाथमें है, यह बात यदि तुम समझ लोगे तो देखोगे कि दुःखी हुए बिना तुम्हारा काम आगे बढ़ेगा। मुझे यदि एक क्षणका भी अवकाश मिला तो मैं 'नवजीवन' में लिखूंगा । 'प्रजाबन्धु की कतरन मिली है। इससे पहले जो कतरन भेजी थी वह नहीं मिली है । मेरा खयाल है मिल जायेगी । १२ गुजराती पत्र (सी० डब्ल्यू ० २६९८ ) से । सौजन्य : डाह्याभाई म० पटेल बापूके आशीर्वाद भाईश्री वालजी, २५४. पत्र : वा० गो० देसाईको [१६ जनवरी, १९२७] आपका पत्र मिला । आपका तार भी मिला था। आपको सारी मूल रचनाएँ भेजने की कोशिश तो हो ही रही है। आपको अनुवाद - कार्यमें लगानेकी इच्छा होती है । काकाको उस बारेमें लिख रहा हूँ । शंकरलालके बहनोईकी [ लेख ] माला तो अभी लगातार चलेगी। लगता है कि उसमें आपकी सेवाओंका उपयोग हो सकता है। उसका सम्पादन काका कर रहे हैं; इसलिए उन्हें लिख रहा हूँ । आपको यह तो याद ही होगा कि [ अखिल भारतीय ] गोरक्षा मण्डल * [की समिति ] की बैठक ११ मार्चको है । आपने सदस्योंके नाम खोजकर उन्हें लिख दिया होगा । १. डाककी मुहरसे। २. अहमदाबादका एक गुजराती साप्ताहिक । ३. डाककी मुहरसे। ४. उस समय वालजी देसाई इस मण्डलके मन्त्री थे । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/५९७
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