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२५६. भाषण : सार्वजनिक सभा, छपरामें' १६ जनवरी १९२७ महात्माजीने दोनों अभिनन्दनपत्रोंके जवाबमें बोलते हुए नगरपालिका और जिला बोर्डको उनके अभिनन्दनोंके लिए धन्यवाद दिया और कहा, मैं दूसरे मसलोंपर भी कुछ शब्द कहूँगा, लेकिन यहाँ आनेका मेरा मुख्य प्रयोजन खादी और चरखके सन्देशका प्रचार करना है। एक अभिनन्दनपत्रमें मेरे उन प्रयत्नोंकी चर्चा की गई है जो मैं अस्पृश्यताकी बुराईको दूर करनेके लिए कर रहा हूँ। मेरे हृदयकी यह उत्कट इच्छा है कि हिन्दू समाजके इस कलंकको मिटा दूं। स्वामी श्रद्धानन्द, जो यही प्रयत्न करते हुए मर मिटे, कहा करते थे कि जबतक प्रत्येक भारतीय नेताके घरमें एक- एक अछूतको परिवार के सदस्यकी भाँति नहीं रखा जायेगा, तबतक यह नहीं कहा जा सकता कि अस्पृश्यता समाप्त हो गई है। पंचम वर्ण हमारा ही बनाया हुआ है; शास्त्रों में इसकी अनुमति नहीं दी गई है। यदि नेतागण अपने घरोंमें अछूतोंको रखें तो कोई कारण नहीं है कि इसके लिए जनता उन्हें दोषी ठहरायेगी। स्वामी श्रद्धा- नन्दका जीवन यही पाठ देता है कि "अछूतों की सेवा करो।" आपको उनके जीवनसे निर्भयताका पाठ भी सीखना चाहिए, और उनकी मृत्युसे साम्प्रदायिकताकी बुराइयों को भी समझ लेना चाहिए। हमारे लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता की बहुत ही बड़ी आवश्यकता है। जबतक यह एकता नहीं स्थापित होती तबतक हम स्वराज्यका स्वप्न भी नहीं देख सकते । अपना भाषण जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि हमारे देशकी गरीबी एक ऐसा तथ्य है जिसे सभी स्वीकार करते हैं। यदि हम अपने देश और अपने धर्मके प्रति सच्चे हैं तो हमें गरीबोंके साथ सहानुभूति हुए बिना रह ही नहीं सकती। गरीबों- की मदद करनेका सबसे अच्छा तरीका यह है कि लोग खादी पहनें। विदेशी या मिल- के बने कपड़ेपर आपको एक कानी कौड़ी भी नहीं खर्च करनी चाहिए। महात्माजीने एक बार फिर उपस्थित लोगोंसे अन्य सब प्रकारके कपड़े छोड़कर केवल खद्दर ही पहननेकी अपील की । इसके बाद उन्होंने घोषणा की कि वे अब स्वयं सभामें खद्दर बेचेंगे, और अपने हाथमें खादीके कुछ टुकड़े लेकर खरीदनेवालोंको आगे आनेका निमन्त्रण दिया । [ अंग्रेजीसे ] सर्चलाइट, २१-१-१९२७ १. इस सभामें, जिसमें करीब दस हजार लोग उपस्थित थे, गांधीजीको नगरपालिका और जिला बोर्डकी ओरसे हिन्दीमें अभिनन्दनपत्र भेंट किये गये । वहाँसे एकमाके लिए रवाना होनेसे पहले गांधीजीने उन हॉलमें औरतोंकी एक सभा में भी भाषण किया । Gandhi Heritage Portal