२५७. भाषण : सार्वजनिक सभा, सिवान में ' [ १६ जनवरी, १९२७] हिन्दू-मुस्लिम एकता की हदतक आप अपने अंचल (सब-डिवीजन) को अन्य भागोंके मुकाबले बेहतर बताते हैं, इससे मुझे खुशी हुई है। लेकिन क्या आप कह सकते हैं कि आपमें ऐसी एकता है कि अन्य स्थानोंपर चाहे जो हो जाये, वह यहाँ नहीं टूटेगी ? मेरी कितनी इच्छा है कि इस विशाल देशमें कमसे कम एक प्रान्त, एक जिला, एक सब-डिवीजन तो ऐसा हो जो गर्वसे कह सके कि संसारकी कोई शक्ति हमारे यहाँ हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा नहीं करा सकती। हम भले ही सोचा करें कि हम जीवित हैं, लेकिन एकताके अभावमें हम मरे हुओंसे गये-बीते हैं। हिन्दू सोचता है कि मुसल- मानोंसे लड़कर वह हिन्दू-धर्मको लाभ पहुँचाता है, और मुसलमान सोचता है कि वह हिन्दुओंसे लड़कर इस्लामको । लेकिन वास्तवमें इस तरह दोनों अपने-अपने धर्मका नाश कर रहे हैं। यह विष दोनों ही जातियोंके लोगोंमें व्याप्त हो गया है। इसमें ताज्जुब भी क्या है ? यदि कोई मनुष्य जीवनके किसी एक क्षेत्रमें गलती करनेमें जुटा हो तो वह दूसरे क्षेत्रमें ठीक काम कर ही नहीं सकता। जीवन तो एक अविभाज्य, समूची चीज है । मैंने कोमिल्ला में कहा कि यह समस्या अब आदमीके हाथसे बाहर हो गई है, और ईश्वरने उसे अब अपने हाथोंमें ले लिया है । सम्भव है मेरे इस कथनके पीछे मेरा अहंकार छिपा हो । लेकिन में ऐसा नहीं मानता। ऐसा न माननेका मेरे पास पर्याप्त कारण है । मैं अपने दिलपर हाथ रखकर कह सकता हूँ कि अपने जीवनमें एक क्षणके लिए भी मैं ईश्वरको नहीं भूलता। पिछले बीस वर्षोंसे मैंने जो कुछ भी किया है, यही मानते हुए किया है कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह ईश्वरको साक्षी रखकर कर रहा हूँ । हिन्दू-मुस्लिम एकताको मैंने अपने जीवनका अनुष्ठान बना लिया था । उसके लिए मैंने दक्षिण आफ्रिकामें काम किया, उसीके लिए मैंने यहाँ मेहनत की, उसके लिए मैंने तपस्या की, लेकिन ईश्वर सन्तुष्ट नहीं हुआ; ईश्वर नहीं चाहता था कि मैं इस कामका कोई श्रेय पाऊँ । और इसीलिए अब मैंने इस कामसे अपने हाथ धो लिये हैं । मैं असहाय हूँ। जितनी कोशिश कर सकता था, मैं कर चुका हूँ। लेकिन चूँकि मुझे ईश्वर में विश्वास है, चूंकि एक क्षणके लिए भी उसपरसे मेरा विश्वास नहीं हटता, चूँकि उसकी दी हुई खुशी और उसके दिये हुए दुःखसे मैं सन्तुष्ट हूँ, इसलिए में अपनेको असहाय भले ही महसूस करूँ, आशा मैं कभी नहीं छोड़ता । मेरे अन्दर कोई चीज कहती है कि हम हिन्दू-मुस्लिम एकताके जितनी जल्दी होने की बात सोचनेकी १. हिन्दी में दिये गये भाषणका यह सार है । २. सिवान, सारन जिलेका एक कस्बा है, जहाँका दौरा, २१-१-१९२७ के सर्चलाइटके अनुसार गांधीजीने १६ जनवरीको किया था। Gandhi Heritage Portal
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