२५८. पत्र : मीराबहनको १७ जनवरी, १९२७ चि० मीरा, हम इस समय गंगाके उत्तरमें हैं इसलिए फिलहाल तुम्हारे पास पत्र पहुँचने में ज्यादा समय लगेगा । जहाँ हम लोग इस समय ठहरे हैं वह राजेन्द्रबाबूकी पैतृक सम्पत्ति है । यह मकान एक दूरस्थ गाँवमें है । फिर भी रेलवे लाइनसे बहुत दूर नहीं है । तुम्हारी हिन्दीमें अब कितनी प्रगति हुई है ? क्या तुम अब बिना हिचके हिन्दीमें बोलती-चालती हो ? क्या तुम्हें हिन्दीमें बातचीत करनेके लिए काफी वक्त मिल जाता है या तुम्हें अपना काम अंग्रेजीकी मददसे ही चलाना पड़ता है ? मुझे आशा है कि तुम आश्रमको पत्र बराबर हर हफ्ते लिख रही होगी । यहाँ काफी ठंडा है । छायामें गर्मी महसूस नहीं होती। मौसम में नमी है, पर है आनन्दप्रद । मन होता है कि दिन- भर पैदल टहला जाये, लेकिन मुझे टहलने का समय बहुत ही कम मिलता है । मैं लगभग २० मार्चतक यहाँ हूँ, मुझे आशा है तबतक तुम वहाँ रहना चाहोगी । लेकिन यदि जगह तुम्हें अनुकूल न पड़ती हो तो वहाँ मत रहना । प्यार सहित, [ पुनश्च : ] तुम्हारा, बापू आशा है तुम्हें मेरा यात्रा - कार्यक्रम मिल गया होगा। अगर न मिला हो, तो तुम खादी-कार्यालय, मुरादपुर, पटनाके पतेसे अपने पत्र भेजना। मुझे डर है कि इस पत्रका तुम्हारा उत्तर मुझतक पहुँचने में करीब १० दिन लग जायेंगे। मैं इसी ३० तारीखको पटना पहुँचूँगा । अंग्रेजी पत्र (सी० डब्ल्यू ० ५१९८) से । सौजन्य : मीराबहन Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६०२
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