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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६०९

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हिन्दी बनाम अंग्रेजी ५८१ ऐसी आशा की जाती है कि रिपोर्ट में लोगोंसे खादी खरीदने की जो प्रार्थना की गई है, वे उसे पूरा करेंगे । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया २०-१-१९२७ २६४. हिन्दी बनाम अंग्रेजी सालमें अबतक जहाँ भी गये हैं । और उस समय कोयला खान क्षेत्रके कर्म- सभाओंके संयोजकोंको बार-बार यह याद दिलानेकी जरूरत दिखाई देती है कि सर्वसाधारणके बीच अभिव्यक्तिका सामान्य माध्यम अंग्रेजी नहीं, बल्कि हिन्दी या हिन्दुस्तानी है । मैंने देखा है कि १९२१ के विपरीत इस गया हूँ, अधिकांश स्थानोंमें मुझे अंग्रेजीमें ही मानपत्र दिये तो यह बेतुकापन बिलकुल स्पष्ट ही हो गया जब झरिया चारियोंकी ओरसे दिये गये मानपत्रको अंग्रेजीमें पढ़ने की कोशिश की गई और सो भी वहाँकी एक ऐसी सार्वजनिक सभामें, जिसमें हजारों लोग उपस्थित थे और उनमें से शायद पचास भी अंग्रेजी समझनेवाले न रहे हों। अधिकांश लोग हिन्दी आसानीसे समझ सकते थे और बहुत सारे लोग बंगला भी समझते । संघके अधिकारी बंगालके थे। अगर अंग्रेजी मसविदा मेरे लिए तैयार किया गया था, तो इसकी कोई जरूरत नहीं थी। वे मानपत्र बंगलामें लिख सकते थे और फिर चाहते तो मुझे उसका हिन्दी या हिन्दी न सही, अंग्रेजी अनुवाद ही दे सकते थे। लेकिन ऐसे विशाल श्रोता समुदायके सामने जबरदस्ती अंग्रेजीमें मानपत्र पढ़ना उसका अपमान है । मुझे आशा है कि अब वह समय आ रहा है जब अगर किसी सभाकी कार्यवाही ऐसी भाषामें चलाई जाती है, जिसे अधिकांश श्रोता नहीं समझ सकते तो वे वहाँसे उठकर चले जायेंगे। मगर उस सभा के सभापतिको इस बात के लिए श्रेय देना चाहिए कि मैंने जैसे ही उनका ध्यान इस बेतुकेपनकी ओर दिलाया, वैसे ही बात उनकी समझमें आ गई और उन्होंने बहुत शिष्टतापूर्वक कह दिया कि ऐसा मान लिया जाये कि मानपत्र पढ़ा जा चुका है । इस घटनासे सभी संयोजकगण चेतावनी लें -- - और विशेष कर आन्ध्र देश, तमिल- नाडु, केरल और कर्नाटकके संयोजक । मैं उनकी कठिनाई समझता हूँ । लेकिन, अब तो उनके बीच हिन्दी प्रचारका काम करते हुए एक सुयोग्य सक्षम संस्थाको छः साल हो गये हैं । उनके मानपत्र अपने-अपने प्रान्तोंकी भाषाओं में होने चाहिए और मेरे लिए उनके हिन्दी अनुवाद कर देने चाहिए । द्रविड़ देशमें मैंने बराबर अपने नियमसे अलग व्यवहार किया है और जब कभी वहाँके लोगोंने चाहा है, अपना भाषण अंग्रेजीमें ही दिया है। लेकिन, मैं समझता हूँ कि अब वह समय आ गया है जब उन्हें बड़ी-बड़ी सार्वजनिक सभाओं में अंग्रेजीका सहारा लेना छोड़ देना चाहिए। सच तो यह है कि अंग्रेजी बोलनेवाले नेताओंने ही हिन्दी सीखनेसे अबतक इनकार करके जनसाधारणके बीच हमारी तीव्र सफलताके मार्ग में बाधा उपस्थित कर रखी है । अगर सीखनेवाले Gandhi Heritage Portal