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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६११

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टिप्पणियाँ ५८३ लोगोंको मैं यह बताना चाहूँगा कि देशबन्धुकी अन्तिम इच्छाएँ क्या थीं। उन्होंने ये इच्छाएँ अपनी पत्नी, अपनी बहन, अपने विश्वस्त सहायकों, सतीशचन्द्र दासगुप्त और मुझपर अपनी मृत्युसे ठीक सात दिन पूर्व जाहिर की थीं। उन्होंने कहा था, मैं जैसे ही दार्जिलिंग से लौटूंगा, तनमनसे चरखा आन्दोलनमें पड़ जाऊँगा। उन्होंने देखा कि हम जो रचनात्मक आन्दोलन चला सकते हैं, उनमें यह सबसे समर्थ है, सबसे बड़ा है, और यह ग्राम संगठन तथा ग्रामोद्धारका सबसे कारगर उपाय है । इसी कारण उन्होंने मुझे सतीशबाबूको उनके पास बुलाने को कहा था। उन्होंने उनके साथ चरखा आन्दोलनकी योजनाको कार्यान्वित करनेके बारेमें विचार किया था । ग्रामोद्धारके लिए संगृहीत राशिमें से अधिकांशका उपयोग वे चरखा आन्दोलनपर ही करना चाहते थे। इसलिए अगर मैं कह सकूं तो कहूँगा कि चरखा-संघ देशबन्धुकी इच्छाओंका स्वाभाविक परिणाम है । संयोजकोंसे अगर सब-कुछ ठीक-ठीक चलता रहा तो इस साल में बिहार, महाराष्ट्रके कुछ हिस्सों, कर्नाटक सहित मद्रास, संयुक्त प्रान्त, बंगाल और उड़ीसाका दौरा करने की उम्मीद रखता हूँ। अगर समय मिला और स्वास्थ्य ठीक रहा तथा लोग स्मारकके लिए, अर्थात् खादी-कार्यके लिए चन्दा देना चाहेंगे, तो मुझे दूसरे प्रान्तोंका भी दौरा करने में खुशी होगी। उड़ीसा वालोंको मैंने जहाँतक सम्भव है, नवम्बर मास वहीं बितानेका वचन दिया है -- सो इसलिए नहीं कि वहाँ में बहुत अधिक चन्दा इकट्ठा करनेकी उम्मीद रखता हूँ, बल्कि इसलिए कि वह प्रान्त हमारी अवदशाका प्रतीक है । मेरी नजरोंमें उसके उद्धारका मतलब भारतका उद्धार है । इस प्रान्तको भारतका सबसे गरीब प्रान्त क्यों होना चाहिए ? यहाँके लोग भारतके दूसरे हिस्सोंके लोगोंसे कुछ घट कर नहीं हैं । उनका अपना एक सुन्दर इतिहास है । वहाँ भव्य मन्दिर हैं । उनके यहाँ जगन्नाथ विराजमान हैं, जो अपनी सृष्टिके प्राणियोंमें कोई भेद नहीं करते। और फिर भी, दुखके साथ कहना पड़ता है कि उन्हीं भव्य मन्दिरोंकी छायामें हजारों लोग भूखसे तड़प-तड़पकर दम तोड़ रहे हैं । यह चिरकालसे दारिद्र्य, अकाल और रोगका प्रदेश बना हुआ है। मैंने उड़ीसा के लोगोंकी तरह हताश, निराश और जीवनशक्तिशून्य लोग अन्यत्र कहीं नहीं देखे हैं । इसलिए मैं नवम्बर मासमें अपने उड़ीसा - निवासकी प्रतीक्षा एक उदास आनन्दके साथ कर रहा हूँ । यह ऐसा प्रान्त है जिसे कताईके लिए आसानीसे संगठित किया जा सकता है, किया जाना चाहिए; क्योंकि यहाँके लोगोंके पास रोजगार नहीं है। सारे उड़ीसाको तो बंगालके अथवा पूरे हिन्दुस्तानके कारखानोंके बीच ले जाकर बसाया नहीं जा सकता। यह सम्भव हो तो भी ऐसा करना गलत होगा। मगर सौभाग्यसे यह सम्भव भी नहीं है। लोगोंको अपनी ही मिट्टीपर रहना है, और प्रत्युत्पन्नमति, परिश्रमी तथा सुखी होना सीखना है। आनन्द क्या चीज है, वे भूल गये हैं, इसलिए उड़ीसाके कार्यकर्ता अपना दायित्व समझें । मैं चाहता हूँ कि वे मन-प्राणसे चरखा आन्दोलनमें Gandhi Heritage Portal