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५८६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय कार्यकर्त्ताओंका कहना है कि अगर हरएक कातनेवालेका सही-सही लेखा-जोखा रखना हो तो उसके लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा। ऐसा हो सकता है । चूंकि मैं खुद किसी खादी केन्द्रकी देख-रेख नहीं करता, इसलिए इस तरहका लेखा-जोखा रखने की कठिनाईको मैं पूरी तरह समझने में असमर्थ हूँ । लेकिन मैं इतना तो निःशंक भावसे कह सकता हूँ कि खर्च चाहे कुछ भी पड़े, जबतक कताईकी प्रवृत्ति अपने आप चलनेवाले एक ऐसे आन्दोलनका रूप नहीं ले लेती जिसके ठप हो जानेका कोई खतरा ही न बचे तबतक कातनेवालोंका पूरा लेखा-जोखा रखना एक अनिवार्य आवश्यकता है। अगर हम आन्दोलनको दृढ़ नींवपर खड़ा करना चाहते हों तो ऐसा लेखा-जोखा रखने में जो भी अतिरिक्त खर्च हो, वह उठाने लायक होगा। प्राप्त होनेवाले और साथ ही साथ खर्च होनेवाले एक-एक पैसेका सही हिसाब रखने का जो महत्त्व लेने-देनेका कारोबार करनेवाली किसी संस्थाके प्रामाणिक अस्तित्व और निरन्तर विकासके लिए है, कातनेवालोंका सही-सही लेखा-जोखा रखनेका वही महत्त्व कताई आन्दोलनके प्रामाणिक ढंगसे चलाये जाने और उसके निरंतर विकासके लिए है । इसलिए मैं आशा करता हूँ कि हर कताई संस्था शीघ्र ही कातनेवालोंका पूरा और अद्यतन लेखा-जोखा रखनेकी ओर प्रवृत्त हो जायेगी । कहनेकी जरूरत नहीं कि यह लेखा-जोखा रखनेका काम उन्हीं कार्यकर्त्ताओंको देना चाहिए जो निष्कलंक चरित्रवाले और पवित्र लोग हों और अगर यह काम स्त्रियाँ करें तब तो कहना ही क्या ? इस आन्दोलनकी इस खामीका पता मुझे सबसे पहले बंगालके कार्यकर्त्ताओंकी तुनक मिजाजीके कारण चला । अभय आश्रमकी रिपोर्ट छापते समय मैंने प्रसंगवश ऐसा कह दिया था कि हमें आंकड़े बताते समय लगभग' और 'तकरीबन' का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इतना कहनेके बाद मैंने चरित्रकी पवित्रताके विषयमें कुछ सामान्य बातें लिखीं। मैंने वे बातें किसी खास व्यक्तिको लक्ष्य करके नहीं लिखी थीं, लेकिन चूँकि वे सामान्य बातें मैंने अभय आश्रमके कामकी चर्चाके सिलसिले में ही कह दी थीं, इसलिए कुछ एक आश्रमवासियोंके मन में शंका उत्पन्न हो गई कि मैंने वे बातें उन्हीं के लिए कही हैं। मुझे उनके मनसे शंकाको दूर करने में कोई कठिनाई नहीं हुई, लेकिन उनके साथ हुई बातचीतसे मेरी समझ में यह बात आ गई और में आश्रम के सदस्यों को भी इस बातकी प्रतीति करा दे सका कि कातनेवालोंका सही-सही और अद्यतन लेखा-जोखा रखना परम आवश्यक है। इसलिए अभय आश्रमकी चर्चा के दौरान लिखे गये उस अनुच्छेदका मुझे कोई खेद नहीं है- भले ही उसका कारण सिर्फ इतना ही हो कि उससे मुझे इस दोषका पता चल गया कि हम कातनेवाले लोगोंका लेखा-जोखा ठीक तरहसे नहीं रखते। मैं सभी सम्बन्धित लोगों की जानकारीके लिए एक बार फिर कह देना चाहता हूँ कि बहुत बड़ी-बड़ी सम्भावनाओंसे आपूरित इस कताई आन्दोलनमें हम इस बातपर जितना भी जोर दें, कम ही होगा कि हमारी संस्थाओंके सदस्योंके लिए सन्देह-शंकासे ऊपर होना और रहना परम आवश्यक है, और अगर हमें ऐसी निष्कलंकता प्राप्त करनी है तो हमें सदाशयतापूर्ण सुझावों, टीकाओं और १. देखिए " अभय आश्रम में खादी कार्यं", ३०-१२-१९२६ । 4 Gandhi Heritage Heritage Portal