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५९२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय इसके सिवाय कोई दूसरा उपाय नहीं है कि उन्हें कोई काम-धन्धा दिया जाये और सबसे अच्छा धन्धा आप उन्हें कताई करनेका दे सकते हैं । भाषण जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि मैंने अभी 'ईशोपनिषद्' का एक श्लोक सुना है जिसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति काम नहीं करता, वह दूसरे लोगोंकी सम्पदाकी चोरी करता है । में पूछता हूँ कि इसका क्या अर्थ है ? इसका अर्थ यह नहीं है कि वह वास्तव में दूसरोंकी सम्पत्तिकी चोरी करता है, बल्कि यह है कि वह दूसरेके श्रमसे उपार्जित भोजनपर जीवित रहता है। जबतक कोई व्यक्ति केवल अपने लिए ही नहीं वरन् सभी मनुष्योंके लिए समानरूपसे काम नहीं करता, तबतक उसे जोनेका अधिकार नहीं है; क्योंकि व्यक्ति तो मानवताके महान् सिन्धु में एक बूंदके समान है । इसी तरह 'गीता' ने मुझे यही शिक्षा दी है कि यज्ञ किये बिना किसीको खाना नहीं खाना चाहिए और गीता-सम्मत अनेक यज्ञों में से दूसरोंके लिए काम करना सबसे अच्छा यज्ञ है। तो फिर सूत कातना ही एक ऐसा काम है जो हजारों लोगों की मदद कर सकता है; वह ऐसा यज्ञ है जिसे सभी कर सकते हैं। स्त्रियोंको सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मेरी दृष्टिमें जितनी भी स्त्रियाँ विदेशी वस्त्र पहनें हैं, वे नंगी जैसी हैं, क्योंकि खद्दरके सिवा और कोई वस्त्र भारती- योंकी नग्नता नहीं ढँक सकता । महात्माजीने लोगों से स्थानीय राष्ट्रीय शाला और गोशालाके मामलोंपर ध्यान देनेका अनुरोध किया और कहा कि जरूरत हो तो वे धन देकर उनकी मदद करें। उन्होंने कहा कि यह हर नागरिकका कर्त्तव्य है कि वह संकटमें पड़े हर मनुष्य और हर संस्थाकी सहायता करे। खद्दर कार्यके लिए धन देने तथा सभामें रखे खावीके मालको खरीदनेकी लोगों से फिर एक बार अपील करते हुए उन्होंने भाषण समाप्त किया । [ अंग्रेजीसे ] सर्चलाइट, २६-१-१९२७ Gandhi Heritage Portal