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५९६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मये आपका यह प्रश्न तथा कितने ही दूसरे प्रश्न ऐसे हैं कि जिनके लिए लिखने, चर्चा करने और समझानेकी विशेष आवश्यकता है। इस प्रश्नके लिए यथोचित रूपसे लिखकर उत्तर दिया जाना अभी कठिन है। इसी कारण आपको 'षड्दर्शन समुच्चय ' ग्रन्थ पहले भेजा था ताकि उसे पढ़ने और विचार करनेसे आपको, थोड़ा ही सही, समाधान हो । और हो सकता है इस पत्रसे भी कुछ विशेष रूपसे समाधान हो । क्योंकि इस सम्बन्धमें ऐसे अनेक प्रश्न उठाये जाने योग्य हैं, जिनका बारम्बार समाधान होनेपर तथा चिन्तन करनेपर समावेश होनेकी सम्भावना है । (२) ज्ञानकी स्थितिमें अर्थात् आत्मस्वरूपके यथार्थ बोधसे उत्पन्न स्थितिमें, यह आत्मा निजभावका अर्थात् ज्ञान, दर्शन ( यथास्थित निर्धार) और सहज समाधि- परिणामका कर्त्ता है । वही अज्ञानकी स्थितिमें क्रोध, मान, माया, लोभादि प्रवृत्तियोंका कर्त्ता है; और इन भावोंका परिणाम-भोक्ता होते हुए भी प्रसंगवशात् घटपटादि पदार्थोंका नैमित्तिक कर्त्ता है अर्थात् इन पदार्थोंके मूल द्रव्यका कर्त्ता नहीं परन्तु इन्हें आकार प्रदान करनेवाली क्रियाका कर्त्ता मात्र है । उसकी इस पिछली स्थितिको जैनधर्म 'कर्म' कहता है; वेदान्त इसका ' भ्रान्ति 'के नामसे उल्लेख करता है और अन्य मतमतान्तर भी इसीके अनुसार विभिन्न नाम देते हैं। पर यदि हम ठीक विचार करें तो आत्मा घटपटादि पदार्थोंका तथा क्रोधादि भावोंका कर्त्ता हो ही नहीं सकता; वह तो केवल ज्ञान- परिणामका ही कर्त्ता है और मात्र निज स्वरूपमें प्रतिष्ठित है. इस बातका हमें स्पष्ट बोध होगा । 2 (३) अज्ञान भावसे किये गये कर्म प्रारम्भमें बीज रूप बनते हैं और कालान्तरमें (कालके संयोगसे) वृक्ष रूपमें प्रतिफलित होते हैं अर्थात् इन कर्मोका भोग आत्माको भोगना पड़ता है; जैसे अग्निके स्पर्शसे उष्णताका सम्बन्ध होता है और उसके परि- णामस्वरूप सहज वेदनाकी प्रतीति होती है । ठीक इसी प्रकार आत्माको भी क्रोधादि भावनाके कर्त्तापनके कारण जन्म-जरा और मृत्यु आदिके वेदनापूर्ण परिणाम भोगने पड़ते हैं । इस विचारपर आप विशेष रूपसे चिन्तन करें और इस विषयमें जो प्रश्न उठें, मुझे लिखें; क्योंकि अपनी समझके अनुसार निवृत्तिके लिए प्रयत्न करते रहनेपर ही जीव मोक्ष दशा प्राप्त करता है । प्र० २ : ईश्वर क्या है ? क्या यह सच है कि वह जगत्कर्त्ता है ? उ० : (१) हम और आप तो कर्म बंधनमें फँसे जीव हैं; और जो इस जीवका सहज स्वरूप है अर्थात् कर्म बन्धनसे परे एक मात्र आत्मस्वरूप -- - वह ईश्वरत्व है । जो ज्ञानादि ऐश्वर्य सम्पन्न है, वही ईश्वर कहलाने योग्य है और ईश्वरका यह ईश्वरत्व ही आत्माका सहज स्वरूप है, कर्म बन्धनोंमें जिसकी प्रतीति नहीं होती । परन्तु यह जानने- पर कि कर्म - बन्धन उसका निजस्वरूप नहीं है प्रत्युत कोई भिन्न रूप है, आत्मा निज स्वरूपमें अन्तर्दृष्टि करता है और तब अनुक्रमसे सर्वज्ञता आदि ऐश्वर्यकी अनुभूतिकी प्रतीति स्वयं अपने में ही करता है । विश्वके समस्त पदार्थोंको देखते हुए आत्मासे बढ़कर विशेष ऐश्वर्य सम्पन्न पदार्थकी अनुभूति हमें नहीं होती । अतः मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर आत्माका ही दूसरा पर्याय है और वह आत्मासे भिन्न कोई विशेष सत्तासम्पन्न पदार्थ नहीं है । Gandhi Heritage Portal