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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६२६

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५९८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय उसका अस्तित्व नहीं देख पाते क्योंकि अन्य चार इन्द्रियाँ उस स्थितिमें अव्यक्त ( अप्रकट ) होती है; अतः यह कहा जाता है कि जीव वहाँ 'पृथ्वीकाय रूप' या पार्थिव स्वरूप है । और जब अनुक्रमसे अपना कर्म-भोग भोगकर जीव निवृत्त हो जाता है तो वहाँ परमाणु रूप पत्थर-भर रह जाता है, परन्तु जीव उससे अपना सम्बन्ध छोड़कर चला गया है इसलिए आहारादिका ज्ञान उसे नहीं होता; मतलब यह कि जीव निरा प्रस्तरवत् जड़ बन जाता है, यह बात नहीं है । कर्मके वैषम्यसे चार इन्द्रियोंका संयोग उसमें व्यक्त नहीं हो पाता और केवल स्पर्शेन्द्रियका संयोग- मात्र जीवको जिस कर्मके परिणाम स्वरूप होता है उस कर्मका भोग भोगनेके लिए वह पार्थिव आदि रूपोंमें जन्म लेता है, पर वह निरा पत्थर या पृथ्वी-रूप जड़ नहीं हो जाता; जानवर बनकर भी निरा जानवर ही नहीं बन जाता । देह लेना तो जीवके लिए वेष धारण करना है, वह कोई उसका स्वरूप नहीं है । [ ६ और ७ ] छठे प्रश्नका समाधान भी इसीमें हो जाता है। इसी प्रकार ७वें प्रश्नका जवाब भी कि केवल पत्थर या पृथ्वीमें कर्मका कर्तृत्व नहीं है बल्कि उनमें अवतरित जीव ही कर्मका कर्त्ता है; और सो भी दूध और पानीकी तरह है । जिस प्रकार दूध और पानी दोनोंका संयोग होते हुए भी दूध, दूध ही होता है और पानी, पानी, उसी प्रकार कर्मबन्धनके फलस्वरूप एकेन्द्रियादिके संयोगसे जीवको पत्थर या जड़त्व प्राप्त होता है; तथापि अन्ततोगत्वा जीव होगा तो जीवत्व रूप ही और उस स्थितिमें भी उसे 'आहार-भय' आदिका भान तो होता ही है यद्यपि वह रहता अव्यक्तावस्थामें है । प्र० ८ : आर्य धर्म क्या है ? क्या सभी धर्मोकी उत्पत्ति वैदिक धर्मसे ही हुई है ? उ० : (१) आर्य-धर्मकी व्याख्या करते हुए सभी अपने पक्षको आर्य-धर्म कहना चाहते हैं। जैन जैनधर्मको, बौद्ध बुद्ध धर्मको, वेदान्ती वेदान्तको आर्य-धर्म कहें यह साधारण-सी बात है तथापि ज्ञानी पुरुष तो उसीको आर्य-धर्म कहते हैं जो आत्माको निजस्वरूपकी प्राप्ति करवानेवाला उत्तम मार्ग है और यही समुचित है । (२) सभी धर्मोकी उत्पत्ति वेदोंसे हो यह संभव नहीं जान पड़ता । वेदोंमें जितना कुछ ज्ञान कहा गया है उससे सहस्र गुना कहीं अधिक गहन ज्ञान श्री तीर्थंकरादि महात्माओंने कहा है, ऐसा मेरा अनुभव है। और इसके आधारपर मैं जानता हूँ कि अल्प पदार्थमें से सम्पूर्णका आविर्भाव नहीं हो सकता और इसलिए वेदोंसे ही सबकी उत्पत्ति है ऐसा कहना समुचित नहीं जान पड़ता । वैष्णवादि सम्प्रदायोंकी उत्पत्ति वेदोंसे हुई है ऐसा माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । जैन और बौद्ध तथा अन्तिम महावीरादि महात्माओंसे पूर्व वेद थे, ऐसा जान पड़ता है । यों वे अत्यन्त प्राचीन ग्रंथ हैं, यह भी जान पड़ता है, तथापि जो कुछ प्राचीन है, वही सम्पूर्ण है या सत्य है ऐसा नहीं कहा जा सकता और न यही कहा जा सकता है कि जो वेदोंके बाद प्रवर्तित हुए हैं वे असम्पूर्ण और असत्य हैं। बाकी वेदोंमें अभिव्यक्त विचार और जैन धर्म में अभिव्यक्त विचार तो अनादि कालसे चले आते हैं । भाव मात्र अनादि है । हाँ, १. मूलमें ये प्रश्न गांधीजीके शब्दों में नहीं हैं, इसलिए इन्हें खण्ड १ में शामिल नहीं किया गया है। Gandhi Heritage Portal