परिशिष्ट ५९९ उनका रूपान्तर होता रहता है। केवल उत्पत्ति या निरा विनाश नहीं हुआ करता । वैदिक, जैन तथा अन्य सभी धर्मोके मन्तव्य अनादि हैं ऐसा मान लेनेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । तब फिर विवाद किसलिए ? तथापि इन सबमें विशेष बलवान और सत्य मान्यताएँ किसकी हैं यह बात मेरे और आपके तथा हम सबके लिए विचारणीय है । प्र० ९ : वेदोंकी रचना किसने की ? क्या वे अनादि हैं? यदि वे अनादि हैं तो अनादिके क्या मानी हैं ? उ० : (१) यह सम्भव है कि वेदोंकी रचना हुए बहुत काल बीत चुका हो । (२) ग्रंथ - रूपसे कोई शास्त्र अनादि नहीं हो सकता । किन्तु उनमें निहित तत्त्वके अनुसार तो सारे शास्त्र अनादि हैं; क्योंकि ऐसे विभिन्न तत्त्वविचार भिन्न-भिन्न जीव भिन्न-भिन्न प्रकारसे कहते आये हैं और यही सम्भावना ठीक प्रतीत होती है । यों तो क्रोधादि भाव भी अनादि हैं और इसी प्रकार क्षमादि भाव भी; हिंसादि धर्म भी अनादि हैं और अहिंसादि धर्म भी; किन्तु हमारे लिए कर्त्तव्य रूप वही हो सकता है जो जीवके लिए कल्याणकारी है । अनादि तो दोनों ही हैं। यह ठीक है कि कभी एककी प्रबलता होती है और कभी दूसरेकी । प्र० १० : 'गीता' का रचयिता कौन है ? वह ईश्वरकृत तो नहीं है ? यदि ऐसी बात हो तो इसका क्या प्रमाण है ? उ० : (१) ऊपर दिये गये उत्तरोंसे इस सम्बन्ध में समाधान होनेकी सम्भावना है । ईश्वरकृतका अर्थ यदि हम ज्ञानी (सम्पूर्ण ज्ञानी) करें तो 'गीता' ईश्वरकृत है ऐसा कहा जा सकता है । पर यदि हम ईश्वरको 'नित्य अक्रिय, ' आकाश तत्त्वकी तरह व्यापक मानें तो उसके द्वारा पुस्तकादिकी ऐसी उत्पत्ति होना सम्भव प्रतीत नहीं होता; क्योंकि यह तो एक साधारण कार्य है और जिसके कर्तृत्वका एक आरम्भ होता है । ऐसा कार्य अनादि नहीं होता । (२) 'गीता' के रचयिता व्यासजी भी माने जाते हैं । महात्मा श्रीकृष्णने यह ज्ञान अर्जुनको दिया था; अतः मुख्य रूपसे रचयिता श्रीकृष्ण ही कहलाते हैं और यह सम्भव प्रतीत होता है । 'गीता' एक श्रेष्ठ ग्रंथ है यह मान्यता अनादि कालसे चली आ रही है। किन्तु वे ही श्लोक अनादि कालसे चले आ रहे हैं, यह सम्भव नहीं । ठीक इसी प्रकार ईश्वर जो कि अक्रिय है उसके द्वारा इसकी रचना हुई हो यह भी सम्भव प्रतीत नहीं होता । यह तो सक्रिय अर्थात् किसी देहधारी द्वारा किया गया कार्य ही हो सकता है । अतः यह बात माननेमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि जो सम्पूर्ण ज्ञानी हैं, वे ईश्वर हैं और ऐसे ज्ञानियों द्वारा प्रबोधित शास्त्र ईश्वरीय शास्त्र हैं । प्र० ११ : क्या यह सच है कि पशु आदिके यज्ञसे किंचित्मात्र भी पुण्यकी सम्भावना है ? उ० : पशुके वधसे, हवनसे या कि उसे दुःख देनेमें पाप ही है, फिर भले ही ऐसा यज्ञमें किया जाये या ईश्वरके धाममें बैठकर किया जाये । हाँ, यज्ञमें जो दानादि क्रियाएँ की जाती हैं वे अवश्य कुछ पुण्यका हेतु हो सकती हैं किन्तु हिंसा-मिश्रित होनेसे वे भी अनुमोदन करने योग्य नहीं हैं । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६२७
दिखावट