६०० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय प्र० १२ : यदि यह कहा जाये कि अमुक धर्म उत्तम हैं तो क्या उसके लिए प्रमाणकी माँग की जा सकती है ? उ० : प्रमाण न माँगा जाये और अमुक धर्म उत्तम भी है बिना प्रमाण ही यदि ऐसा प्रतिपादन किया जाये तब तो अर्थ और अनर्थ, धर्म और अधर्म सभी श्रेष्ठ ही माने जायें । उत्तम अनुत्तम तो प्रमाण द्वारा ही जाने जा सकते हैं। जो धर्म संसारको परिक्षीण करनेमें सर्वोत्तम और आत्माको निजस्वरूपमें प्रतिष्ठित करनेमें समर्थ हो वही उत्तम और समर्थ है। प्र० १३ : ईसाई धर्मके सम्बन्धमें आप कुछ जानते हैं? यदि आप कुछ जान- कारी रखते हैं तो अपने विचार व्यक्त करें । उ० : ईसाई धर्मके सम्बन्धमें मैं साधारणरूपसे कुछ जानकारी रखता हूँ। भारत- वर्षमें महात्मा पुरुषोंने जैसे धर्मका अन्वेषण एवं चिन्तन किया है वैसे धर्मका चिन्तन- परिशीलन और किसी देशमें नहीं किया गया, यह बात तो थोड़ेसे अध्ययन द्वारा ही जानी जा सकती है। इस ईसाई धर्ममें जीवको सदा पराधीन ही प्रतिपादित किया गया है और मोक्षको लेकर भी जीवकी वैसी ही स्थिति मानी है । जिस धर्ममें जीवके अनादि स्वरूपका प्रतिपादन समुचित रूपसे नहीं किया गया हो और न कर्म व्यवस्था तथा उसकी निवृत्तिके सम्बन्धमें ही योग्य विवेचन किया गया हो, वह धर्म सर्वोत्तम धर्म है, मेरी दृष्टिमें यह कदापि सम्भव नहीं हो सकता। ईसाई धर्ममें जैसा कि मैंने ऊपर कहा है वैसा कोई यथोचित समाधान नहीं दीख पड़ता । मतभेदके वशीभूत होकर मैं यह बात नहीं लिख रहा हूँ । यदि आपको विस्तारसे पूछनेकी आवश्यकता प्रतीत हो तो पूछें। विस्तारसे पृच्छा करनेपर विशेष समाधान करना सम्भव हो सकेगा । प्र० १४ : वे ( ईसाई धर्मवाले) कहते हैं कि 'बाइबिल ' ईश्वर प्रेरित है और ईसामसीह ईश्वरके अवतार, उसके पुत्र, हैं और थे । 1 उ० : यह बात तो श्रद्धाके आधारपर मानी जा सकती है परन्तु प्रमाण द्वारा सिद्ध नहीं है । जैसा कि 'गीता' और 'वेद' के ईश्वर प्रेरित होनेके बारेमें ऊपर कहा गया है, ठीक वही बात 'बाइबिल 'के बारेमें भी मानी जाये। जो जीवन-मृत्युसे मुक्त हो वह ईश्वर अवतार ले यह सम्भव नहीं, क्योंकि रागद्वेषादि परिणाम ही जन्मके हेतु हैं, जो इनसे रहित है वह ईश्वर अवतार धारण करे- - विचार करनेपर यह बात यथार्थ प्रतीत नहीं होती । ईसामसीह ईश्वरके पुत्र हैं और थे इसे भी किसी रूपकके तौरपर मान लिया जाये तो बात जम सकती है अन्यथा प्रत्यक्ष प्रमाणके आधारपर तो इसमें बाधा ही पहुँचती है। ऐसी यह और इसी प्रकारकी अन्य बातें विचारणीय हैं और इनका विचार करनेपर मुझे लगता है कि यह बात समुचित नहीं है । प्र० १५ : ' पुराना करार 'में जो भविष्य कथन किया गया है, क्या वह ईसाके जीवनमें खरा उतरा है। उ० : यदि ऐसा हो भी तो उन दोनों शास्त्रोंके विषयमें विचार करना आवश्यक है । इसी प्रकार वह भविष्य भी इस बातका सबल प्रमाण नहीं है कि ईसामसीह Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६२८
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