परिशिष्ट ६०३ प्राप्त हो जायें। और यदि यह बात सम्भव हो तो पुनः विषमताकी स्थिति कैसे बन पड़ेगी ? प्रकृति-स्वरूपसे जीवमें विषमता हो सकती है और साकार स्वरूपमें समत्व -- यदि प्रलयकी बात इस प्रकार स्वीकार की जाये तो भी देहादिके आश्रयके बिना विषमताका आधार क्या होगा? यदि देहादि सम्बन्ध मान लिया जाये तो हमें सबके लिए एकेंद्रियत्वका भाव मानना होगा और उसे मान लेनेपर अकारण ही हमें अन्य गतियोंको अस्वीकार करना होगा अर्थात् ऊँची गतिवाले जीवके लिए, जो आवागमनके चक्करसे मुक्त होने जा रहा है, अपनी उस गतिसे च्युत होनेका प्रसंग उपस्थित होगा -- इस प्रकार अनेक शंकास्पद बातें खड़ी होंगी । अतः सर्व जीवाश्रयी एकान्तिक प्रलय सम्भव प्रतीत नहीं होता । प्र० २४ : क्या यह सम्भव है कि एक अपढ़ व्यक्तिको भी भक्तिके सहारे मोक्ष मिल जाये ? उ० : भक्ति ज्ञानका कारण है और ज्ञान मोक्षका । अक्षरज्ञान न होनेसे ही किसीको अपढ़ कहा जाये और इसलिए यह माना जाये कि उसे भक्ति प्राप्त नहीं होगी तो ऐसी कोई बात नहीं है । जीव मात्र ज्ञान-स्वभावी है । भक्तिका बल पाकर ज्ञान निर्मल होता है और निर्मल ज्ञान मोक्षका हेतु होता है । सम्पूर्ण ज्ञानकी समा- वृत्ति हुए बिना पूर्ण मोक्षकी प्राप्ति मुझे सम्भव नहीं जान पड़ती। और सम्पूर्ण ज्ञान होनेपर समस्त भाषा ज्ञान होना अनिवार्य है, यह कहनेकी आवश्यकता नहीं । भाषा- ज्ञान ही मोक्षका हेतु होता है और वह जिसे नहीं होता उसे मोक्ष प्राप्ति नहीं होती, ऐसे किसी नियमकी सम्भावना नहीं है । प्र. २५ : कृष्णावतार और रामावतार क्या सच्ची बातें हैं ? यदि हैं तो उनका क्या आशय है ? क्या वे ईश्वर थे या उसके अंशावतार ? उनको माननेसे मोक्ष प्राप्तिकी सम्भावना है ? उ० : (१) दोनों ही महात्मा थे यह तो मेरा भी निश्चय है । वे आत्मस्वरूप थे इसलिए ईश्वर भी थे। यदि उनके सारे आवरण नष्ट हुए हों तो इस बात में भी कोई विवाद नहीं कि उन्हें मोक्ष प्राप्ति हुई हो। कोई जीव ईश्वरका अंश है ऐसा मुझे नहीं जान पड़ता क्योंकि इसके विरोध में अनेक प्रमाण देखनेमें आते हैं। जीवको ईश्वरका अंश मान लेनेपर बन्धन और मोक्ष आदि सब व्यर्थ सिद्ध होंगे क्योंकि उस स्थितिमें स्वयं ईश्वर ही अज्ञानादिका भी कर्त्ता हो जायेगा; और जो अज्ञानादिका कर्त्ता हो उसे तो स्वाभाविक ही अनीश्वरत्व प्राप्त होगा और वह अपना ईश्वरत्व खो बैठेगा । यदि ऐसा हो तो जीवका स्वामी बननेके प्रयास में ईश्वरको हानि उठानेका ही प्रसंग उपस्थित होनेकी सम्भावना है। दूसरी ओर यदि जीवको ईश्वरका अंश मान लिया जाये तो उसके लिए पुरुषार्थ करनेकी कल्पना क्योंकर ठीक बैठेगी। क्योंकि वह स्वयं तो कुछ कर्त्ता हर्त्ता नहीं माना जायेगा । इन्हीं विविध कारणोंके आधारपर जीवको ईश्वरका अंश माननेके लिए मेरी बुद्धि तैयार नहीं होती; फिर श्रीकृष्ण या राम-जैसे महात्माओंको उस कोटिमें गिननेकी मेरी बुद्धि क्योंकर हो ? वे दोनों ही 'अव्यक्त' ईश्वर थे ऐसा मान लेनेमें एतराज नहीं, तथापि उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्यं प्रकट हो चुका था या नहीं, यह बात विवादास्पद है । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६३१
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