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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६३२

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६०४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय (२) इसका उत्तर सहज है । जीवके लिए सम्पूर्ण राग-द्वेषका, अज्ञानका अभाव होना ही मोक्ष है । जिस किसीके उपदेशसे यह बात हो सकती हो उसके प्रति श्रद्धा रखी जाये और उसके परमार्थ स्वरूपका चिन्तन किया जाये तथा इस चिन्तनके परिणाम- स्वरूप स्वात्माके सम्बन्धमें भी हमारी वैसी ही निष्ठा प्रतिष्ठित हो जाये और ऐसे महात्माके आत्मस्वरूपमें हमारा एकात्मभाव हो जाये तो मोक्ष प्राप्ति होना सम्भव है । अन्य उपासनाएँ एकान्तिक मोक्षका हेतु नहीं हो सकतीं, वे केवल उसके साधनका हेतु हो सकती हैं; पर यह निश्चित रूपसे होगा ही, ऐसा कहना समुचित न होगा । प्र० २६ : ब्रह्मा, विष्णु, महेश कौन हैं ? उ० : सृष्टिके कारण रूप तीन गुण मानकर इनके आधारपर यह स्वरूप निर्धारित किया गया हो तो बात ठीक बैठती है तथा ऐसे ही अन्य कारणोंके आधारपर ब्रह्मादिका स्वरूप समझा जा सकता है । पर पुराणोंमें जैसा उनका स्वरूप वर्णन किया गया है वैसा ही वह है ऐसी मान्यतामें मेरा विशेष रुझान नहीं है । क्योंकि पुराणों में उपदेशकी दृष्टिसे अनेक स्थलोंपर रूपक वर्णन भी प्रतीत होते हैं । तथापि मुझे लगता है कि हमें भी उपदेशके तौरपर तो उसका लाभ लेना ही चाहिए; पर ब्रह्मादिके स्वरूपकी सैद्धान्तिक व्याख्याके पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए । प्र० २७ : यदि मुझे साँप काटने आ रहा हो तो मैं उसे काटने दूँ या मार डालूँ ? मुझमें उसे अन्य किसी प्रकारसे दूर करनेकी शक्ति नहीं बच गई है - इस स्थितिका खयाल करके ही यह बात पूछ रहा हूँ । उ० : यदि यह कहा जाये कि आप साँपको काटने दें तो यह बात उलझनमें डाल देती है । तथापि आपने यदि यह मान लिया हो कि 'देह तो अनित्य है' तब फिर इस असार-भूत देहकी रक्षाके लिए आपका उस साँपको मार डालना कैसे उचित माना जा सकता है, जिसे अपने शरीरके प्रति ममत्व है। जिसे अपने आत्महितकी ही चिन्ता है उसे तो ऐसे प्रसंगपर देहका त्याग कर देना ही उचित है। हाँ, जिस व्यक्तिमें आत्महितकी अभिलाषा नहीं जगी है, उसे क्या करना चाहिए? तो इसका उत्तर तो यही दिया जा सकता है कि उसे नरकादिमें भ्रमण करते रहना चाहिए। स्पष्ट ही उसे भी सर्पको मार डालनेका उपदेश तो किस प्रकार दिया जा सकता है ? अनार्य-वृत्ति हो तो मारनेका उपदेश दिया जा सकता है । पर ऐसी वृत्ति तो आपमें और मुझमें स्वप्नमें भी न हो, हम यही अभिलाषा करें । संक्षेपमें ये उत्तर देकर अब मैं पत्र पूरा करता हूँ । 'षड्दर्शन समुच्चय' विशेष रूपसे समझनेका प्रयत्न करें । इन प्रश्नोंके उत्तर में मैंने जो कुछ लिखा है उसकी संक्षिप्तताके कारण आपको कहीं भी कोई दुविधा या असमंजस हो तो आप विशेष रूपसे उसे स्पष्ट करनेको कहें और जो-कुछ आप पत्र द्वारा पूछना उचित समझें, पूछें। मैं बहुत करके उत्तर दूँगा । प्रत्यक्ष भेंट में विशेष समाधान होगा और यह उचित जान पड़ता है। [ गुजरातीसे ] श्रीमद् राजचन्द्र Gandhi Heritage Portal