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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६३३

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प्रिय मित्र, परिशिष्ट २ रोमाँ रोलाँका पत्र गांधीजीके नाम आपका सुखद पत्र' मिला जो मीराने मुझे भेजा है। इसके लिए मैं आपको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ । लेकिन मेरी समझमें यह नहीं आया कि कविने आपसे ऐसी क्या बात कही है। 'लिबर अमीकोरम' में आपके लेखके सम्बन्धमें मैंने ठाकुर [ रवीन्द्र- नाथ से न तो कुछ कहा है और न उन्हें कुछ लिखा ही है। इस सम्बन्धमें कविके दलके किसी व्यक्तिसे भी मेरी कोई बातचीत नहीं हुई । यदि मैं ऐसा करता भी तो केवल उन शब्दोंसे मुझे जो आनन्द मिला है तथा जितना मैं कृतज्ञ हुआ हूँ उसे प्रकट करने भरके लिए करता । आप-जैसे व्यक्तिकी विवेक-बुद्धिके विरुद्ध शिकायत करनेका विचार मेरे मनमें आ ही कैसे सकता था ? आपकी सेवामें मैं स्वयंको अर्पित कर सका तथा आपके विचारोंका संसारमें प्रचार करनेमें सफल हुआ, इसे तो मैं अपना परम सौभाग्य मानता हूँ । मैं तो एक मुक्त दास होनेका दावा करता ही हूँ- - इस बातपर आपत्ति करने- का तो सवाल ही नहीं उठता। ऐसे विचार रखनेका मुझपर आरोप लगाया गया है, यह देखकर मुझे दुख हुआ है । मैं इस बातको बिलकुल नहीं समझ पाता । निःसन्देह ये सब रिपोर्ट निराधार हैं जो अकारण शुरू होती हैं, फैलनेके साथ-साथ जिनमें नमक मिर्च लगता जाता है और फिर इतनी ज्यादा गलतफहमी पैदा हो जाती है। इस बातको मनसे बिलकुल मिटा देना चाहिये, क्योंकि यह बिलकुल निर्मूल है। प्रिय मित्र, मैं आपसे प्रेम करता हूँ, आपका आदर करता हूँ। मेरी विनती है कि आप सदाकी भाँति अपने जीवन-भर मेरे प्रति और दूसरोंके प्रति वैसे ही ईमानदार व्यक्ति बने रहें जो न किसीकी प्रशंसा करता है न चाटुकारिता, और जो उतनी ही बात कहता है, जितनी सोचता है। आपकी उपस्थितिमें मेरा सारा अहंकार काफूर हो जाता है । महादेव देसाईके हस्तलिखित अंग्रेजी मसविदे (एस० एन० १३२८८) की फोटो- नकलसे । १. देखिए खण्ड ३१, पृष्ठ ५६५ । Gandhi Heritage Portal