परिशिष्ट ६०७ कर दिया गया। इससे ५० प्रतिशतकी बढ़ोतरी हुई, जो मानना होगा कि वास्तवमें अनुचित है । मैं समझता हूँ कि आपको यह जानकारी भी दिलचस्प लगेगी कि जिस भू-क्षेत्रको अब 'केनियाका उपनिवेश और संरक्षित राज्य' के नामसे जाना जाता है, उसमें १० मील लम्बी तटवर्ती भू-पट्टी शामिल है जो जंजीबारके सुलतानके आधिपत्यमें है और जिसके लिए केनियाकी सरकार, जिस दिनसे उसने देशका शासन सँभाला है उसी दिनसे जंजीबारके सुलतानको सालाना किराया दे रही है । और ब्रिटिश सरकारने जंजीबारके सुलतानके साथ जो संधि की थी उसके अन्तर्गत दोनों पक्ष इस बातपर सहमत हो गये थे कि इस दस मीलकी भू-पट्टी में रहनेवाले निवासियोंपर उन करोंके अलावा जिनकी परिगणना और उल्लेख तथाकथित संधिमें हैं, अन्य कोई नये कर नहीं लगाये जायेंगे और ऐसा समझा जाता है कि इस गैर-वतनी व्यक्ति कर के लगानेके सम्बन्धमें ब्रिटिश सरकारको जंजीबारके सुलतानकी अनुमति प्राप्त नहीं है । पिछले महीने केनिया विधान परिषदने गैर-वतनी व्यक्ति कर (संशोधन) अध्यादेश पास किया है जिसके अनुसार सरकार हरेक गैर-वतनी एशियाई पुरुषसे उपर्युक्त ३० शिलिंगके बजाय ५० शिलिंग लेगी । इस करको तथा दूसरे करोंको ( जितना ब्यौरा नीचे दिया गया है) लगानेका कारण यह दिया जाता है कि इससे यूरोपीय और भारतीय बच्चोंको शिक्षा दी जायेगी; लेकिन मुझे लगता है कि केनियाकी सरकार उपर्युक्त दलील देते हुए यह भूल गई है कि शुरूसे अबतक केनियाकी सरकार यूरोपीय बच्चोंकी शिक्षापर काफी बड़ी राशि व्यय कर चुकी है और वह भी भारतीय बालकों- की शिक्षाकी उपेक्षा करके तथा उनकी शिक्षाको हानि पहुँचाकर । और अबतककी व्यवस्था 'सामान्य कर' में से की जाती थी। लेकिन मुझे लगता है कि भारतीयोंपर कर थोपनेकी दृष्टिसे सरकारने इस नई पद्धतिका प्रयोग किया है जो मेरी राय में दुष्टतापूर्ण और अनुचित है । लेकिन केनिया विधान परिषदके दो मनोनीत भारतीय सदस्यों सर्व श्री जे० बी० पण्ड्या तथा शमसुद्दीन द्वारा पेश की गई अल्पसंख्यक रिपोर्टसे ऐसा लगता है कि केनियाकी सरकारको शिक्षाके लिए ५२,००० पौंडकी जरूरत है और इस राशिका निर्धारण नीचे लिखे प्रकारसे किया गया है । यूरोपीय भारतीय ३२,००० पौंड, ९६० बालकोंके लिए अर्थात् प्रति बालक लगभग ३३ पौंड १७ शिलिंग २०,००० पौंड, २,३१८ बालकोंके लिए अर्थात् प्रति बालक ८ पौंड १२ शिलिंग इससे कोई भी आसानीसे समझ सकता है कि केनियामें भारतीयोंकी शिक्षाकी कितनी उपेक्षा की गई है । ऊपर बालकोंकी जिस संख्याका उल्लेख किया गया है उसके अलावा २,५४७ भारतीय बालक ऐसे हैं जिनके पास शिक्षा प्राप्त करनेका कोई साधन नहीं Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 32.pdf/६३५
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