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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५१

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१०३. पत्र : मीराबहनको दुबारा नहीं पढ़ा शोलापुर २१ फरवरी, १९२७ चि० मीरा, | दिल्लीसे लिखा तुम्हारा पत्र मिला । तुमने गुरुकुलोंके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, उसपर मैंने ध्यान दिया है। मुझे रामचन्द्रका पत्र अभी नहीं मिला है । तुम्हारे गुरुकुल जानेका मुझे बिलकुल दुःख नहीं है । गुरुकुलोंको चलानेका प्रयत्न बड़े शुद्ध हृदयसे किया जा रहा है। मैं चाहता हूँ कि तुम इन मामलोंपर रामदेवजी और अन्य लोगोंसे बातचीत करो। जब तुम उनसे प्रेमपूर्वक बात करोगी, तो तुम्हारी बातका उनपर असर पड़ सकेगा। हमें लोगोंको उन्हींके पैमानेसे नापना चाहिए और यह देखना चाहिए कि वे उसपर किस हृदतक पूरे उतरते हैं। तुम्हें इस चेतावनीकी जरूरत नहीं है; लेकिन यह देखकर कि तुमने अपने लिए एक कठोर मापदण्ड बना लिया है और तुम अजनबी वातावरणमें हो, मुझे यह चिन्ता रहती है कि तुम्हारा सन्तुलन रत्ती भर भी न बिगड़े । सकता । आज मुझपर कामका इतना अधिक भार है कि मैं इससे ज्यादा नहीं लिख सस्नेह, तुम्हारा, बापू [ पुनश्च : ] सतीश बाबूके सबसे बड़े बेटेका देहावसान हो गया है। उन्हें खादी-प्रतिष्ठान, सोदपुर, कलकत्ताके पतेपर पत्र लिखना । २६ बेलगाँव ५ बम्बई ६-७ अकोला ( मणिलालका विवाह ) ८ नम्बई ९-१४ आश्रम अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२०६ ) से । सौजन्य : मीराबहन ३३-८ Gandhi Heritage Portal