११८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय इससे में बालक और वृद्ध सब लोगोंसे प्रार्थना करता हूँ कि वे इन दोनों कार्यों में कभी न चूकें । गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८०५३) से । सौजन्य : रावजीभाई नाथाभाई पटेल १०८. पत्र : आश्रमकी बहनोंको बापूके आशीर्वाद शोलापुर सोमवार, माघ बदी ५ [ २१ फरवरी, १९२७] बहनो, तुम्हारा पत्र मिला । देखता हूँ कि तुम्हारा पिंजाई आदिका काम ठीक चल रहा है। इसी तरह नियमित रूपसे चलता रहेगा तो तुम सब थोड़े समयमें बहुत प्रगति कर लोगी । नियमित रूपसे किये गये कामका असर नियमपूर्वक ली गई खूराककी तरह होता है । वह आत्माका पोषण करता है । एक साथ ही ज्यादा मात्रामें ली हुई खुराक जैसे शरीरको बिगाड़ देती है, वैसे ही एक साथ अधिक काम करनेसे आत्माको तकलीफ होती है । आज हम शोलापुरमें हैं। यह बड़ा शहर है। यहाँ पाँच मिलें हैं । उनमें सबसे बड़ी मिल मोरारजी गोकलदासकी है। उनके पोते शान्तिकुमार उम्र में तो अभी नवयुवक हैं, परन्तु उनकी आत्मा महान है । वे खुद खादीप्रेमी हैं और खादी ही पहनते हैं । यह कोई उनका सबसे बड़ा गुण है, में यह नहीं कहना चाहता। उनमें दया है, उदारता है, नम्रता है, ईश्वरपरायणता है, सत्य है । यथा नाम तथा गुण हैं । शान्तिकी मूर्ति हैं। करोड़पतिके यहाँ ऐसा रत्न है, यह देखकर मुझे बहुत आनन्द होता है । उनकी धर्मपत्नी के साथ तो मेरा परिचय थोड़ा ही था । कल भोजन करते समय उन्हें पास बिठलाकर उनसे जी भरकर बातें कीं और अपने पतिकी तरह सेवाकार्य में लग जाने को कहा। तुम सबकी मिसाल उनके सामने पेश की, क्या यह मैंने ठीक किया ? ऐसा उदाहरण देनेमें कुछ अभिमान हो तो ? तुम सब सेवाभावसे भरी हो, यह कहा जा सकता है या नहीं, यह तो तुम जानो । मेरे मुँहसे तो निकल ही गया । उसे सच्चा साबित करना तुम्हारे हाथमें है । 1 गुजराती (जी० एन० ३६४०) की फोटो नकलसे । बापूके आशीर्वाद Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५६
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