११३. पत्र : बी० एफ० मदानको गुलबर्गा २२ फरवरी, १९२७ प्रिय मित्र, आपका हालका पत्र मिला । धन्यवाद । संलग्न पत्रके बारेमें आपका क्या कहना है, जवाब देते समय इसे वापस भेजने की कृपा करें। आपने श्री शराफके बारेमें जो लिखा है, उसका में ध्यान रखूंगा । क्या आपको नहीं लगता कि श्री वाडियाके इस कथनमें काफी बल है कि मुद्रा अनुपातका सवाल मानकके चिरस्थायी प्रश्नसे अलग करके नहीं देखना चाहिए । या क्या आप यह मानते हैं कि रुपयेका संविधिगत मूल्य स्वर्णके रूपमें ही है इसलिए यदि संतोषजनक ढंगसे अनुपातकी दर निश्चित हो जाये और आयोगकी अन्य सिफारिशें' या तो छोड़ दी जायें या उन्हें उनके वर्तमान रूपमें लागू कर दिया जाये, तो इतनेसे ही हमें पूरी तरह सन्तोष मान लेना चाहिए। दूसरे शब्दोंमें यदि आपको इन सबमें से चुनाव करना हो तो आप क्या करेंगे ? अनुपातको १ : १५ पर तय करके बाकी सभी बातें जैसीकी-तैसी रहने दी जायें; या अनुपात १ : ५० का तय कर दिया जाये और आयोग द्वारा उल्लिखित रिजर्व बैंकके साथ स्वर्ण मुद्रा मानक स्थापित किया जाये; या शुद्ध स्वर्ण मानक स्थापित कर दिया जाये, टकसालें पुनः खोल दी जायें; उनमें सोनेकी मुहरें बिना रोक-टोक बनें और प्रो० वाडियाके सुझावके अनुसार एक ऐसे केन्द्रीय बैंककी स्थापना कर दी जाये, जिससे अनुपातपर किसी संविधिक कार्य- वाहीका प्रभाव न पड़ सके । क्या आपने सर्वश्री वाडिया और जोशीके विधेयकका मसविदा देखा है ? अंग्रेजी (एस० एन० १२९००) की माइक्रोफिल्मसे । १. स्वर्ण मुद्रा मानक तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया विधेयकमें निहित सिफारिशें । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६०
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