सम्मानजनक समझौता १२७ बाहर छोड़ देता तो उससे मुझे स्वयं विठोबाको अपमानित करनेका पाप लगता । यदि कोई नास्तिक भी हमारे मन्दिरमें प्रवेश करे तो उसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रभु अपनी चिन्ता आप कर सकते हैं। दुनियामें ऐसा कौन है जो मूर्ति में व्याप्त भगवान्का अपमान कर सके ? मेरे साथ जो यूरोपीय महिला थीं, वे बौद्ध धर्मावलम्बिनी हैं और इसलिए वे तो हिन्दू हैं। अगर उन्हें मन्दिरमें आनेका अधिकार नहीं है तो और किसे हो सकता है? मैं कितने ही तीर्थ स्थानोंमें गया हूँ, और वहाँ मुझे पाखण्ड और विषय- लोलुपता देखकर दुःख हुआ है। कुछ मन्दिरोंके पुजारी शराबी और भ्रष्ट हैं। हमें पहले उनका सुधार करना जरूरी है। अगर आज जैसी ही स्थिति बनी रही, अगर हमने कुछ काम न किया और आवश्यक तपश्चर्या और आत्मशुद्धि न की तो मैं कहता हूँ कि २२ करोड़ हिन्दू भी हिन्दू-धर्मको जीवित नहीं रख सकेंगे । हिमालयके निष्कलंक धवल होनेका कारण निर्मल महिमा सम्पन्न अगणित ऋषि-मुनियोंका उसकी गुहाओंमें तपश्चर्या करते हुए अपने प्राण-समर्पण करना ही है । आज केवल ऐसी ही तपश्चर्या हमें और हमारे धर्मको नष्ट होनेसे बचा सकती है। [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १०-३-१९२७ ११९. सम्मानजनक समझौता दोनों पक्षोंके लिए सम्मानजनक समझौता करानेपर सर मुहम्मद हबीबुल्लाह और उनके साथी बधाईके पात्र हैं । यह हमारी कल्पनाका सर्वोत्तम समझौता तो नहीं है; फिर भी आजकी इन स्थितियोंमें यह यथासम्भव सर्वोत्तम समझौता अवश्य है । मुझे इसम शक है कि कोई दूसरा शिष्टमण्डल इससे अधिक सफलता प्राप्त कर सकता । कालों और गोरोंको अलग-अलग क्षेत्रों में रखनेके जिस विधेयकके कारण वहाँ संघर्ष हुआ था और जिस विधेयकके सम्बन्धमें यह परिषद बुलाई गई थी वह विधेयक अब रद हो गया है। परम माननीय श्री श्रीनिवास शास्त्री शिष्टमण्डलके दक्षिण आफ्रिकाको रवाना होनेपर हमें अन्य सदस्योंसे अधिक पत्र लिखते थे और उन्होंने हमें तभी चेतावनी दे दी थी कि परिषदसे बहुत अधिक परिणाम की आशा नहीं रखी जा सकती । मगर अब परिषदके समाप्त हो जानेपर उन्होंने परिषदमें किये गये प्रयत्नोंके परिणाम पर संतोष व्यक्त किया है। मगर सभी समझौतोंकी तरह इस समझौते में भी खतरेकी कुछ बातें तो हैं ही । एक ओर तो वर्गक्षेत्र विधेयक वापस ले लिया जाता है, दूसरी ओर दक्षिण आफ्रिकी भारतीयोंके प्रत्यावर्तनकी नीतिको उनके पुनः प्रवासकी नीतिमें बदलकर वही स्थिति कायम कर दी जाती है। अगर " पुनः प्रवास" नाम अधिक गौरवास्पद है, तो इसमें खतरे भी अधिक हैं। प्रत्यावर्तन तो केवल हिन्दुस्तानतक ही सीमित हो सकता है, Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६५
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