१२०. टिप्पणियाँ एक सीधी-सादी सलाह मैंने अपने दौरेमें देखा है कि कुछ सभाओंमें मेहमानके आने और मानपत्र पढ़ना शुरू होनेके बाद स्वयंसेवक तुरन्त ही बिना सोचे-समझे कागजात, जैसे मानपत्रों आदिकी प्रतियाँ वगैरा बाँटना शुरू कर देते हैं । वे यह नहीं समझते कि इससे कोलाहलपूर्ण और अशान्त सभाओं में नये सिरेसे गड़बड़ी होने लगती है । अगर पर्चे बाँटने ही हों तो सभाओंकी कार्रवाई शुरू होनेसे पहले ही बाँट दिये जाने चाहिए। लोग यह भी नहीं समझते कि अगर पर्चे बांटे जाते हों, तो फिर जो कोई भी माँगे उसे वे दिये जाने चाहिए। पर्चोकी हजारों नकलें न छपाई जायें तो बड़ी-बड़ी सभाओं में ऐसा सम्भव नहीं है । मेरी रायमें यह सार्वजनिक पैसेको बिलकुल बरबाद करना होगा। जो कुछ निहायत जरूरी बातें होंगी, उन्हें स्थानीय अखबार छापेंगे ही और जनताको अपने अखबारों में छपे विवरणोंसे ही सन्तोष करना चाहिए। अगर उन पचके बिना सभाओं की कार्रवाई ठीक-ठीक समझी न जा सके, तो उन्हें बेचनेमें कुछ हर्ज नहीं है । उस हालत में पक्षपातका सवाल ही नहीं हो सकता। इसलिए जो लोग पर्चे लेना चाहते हों, वे उन्हें नाम मात्रका मूल्य देकर ले सकते हैं और उस पैसे से छपाईका खर्च और सभाओंके प्रबन्धका भी कुछ खर्च, वह थोड़ा ही क्यों न हो, निकल सकता है । । राष्ट्र के निधि-रक्षक थोड़ा ही पूर्व विचार कर लें तो बहुतसी मुसीबतें कम हो सकती हैं और बहुत- सा समय और धन बचाया जा सकता है। अक्सर इन सभाओंमें में सार्वजनिक धन पानीकी तरह बहाया जाता देखता हूँ। सभी सभाओंके प्रबन्धक, खासकर खादी-सम्बन्धी सभाओंके प्रबन्धक, यह बात हृदयंगम कर लें कि हमारा देश दुनियामें सबसे गरीब देश है, अगर अन्य किसी कारणसे नहीं तो केवल इसी कारण कि उसकी प्रति व्यक्ति आमदनी तीन पैसे रोजसे भी कम है। यहाँ लाखों आदमी अधभूखे रहते हैं। इसलिए संयोजक समझ लें कि राष्ट्रके रक्षकके नाते उनका यह कर्त्तव्य है कि वे सार्वजनिक धनका उपयोग कंजूसीसे करें और बिना सोचे और बिना जरूरत एक पाई भी खर्च न करें। यह भी समझ लें कि इकट्ठा किया गया प्रत्येक पैसा भूखों मरनेवालोंके लिए है और उस पैसेकी कीमत प्रायः किसी विधवाकी एक दिनकी कमाईके बराबर होती है । इसलिए उन्हें बिना जरूरत एक पैसा भी खर्च नहीं करना चाहिए। मसलन वे कागजी सजावटमें रुपया लगाते हैं, किन्तु यह जमाना सजावटका नहीं है। इसलिए वे सिवा उस सजावटके जो लोगोंको आकर्षित करनेके लिए बिलकुल जरूरी हो, अन्य कोई सजावट न करें और जितना पैसा बचा सकें, उतना बचायें। इस दशामें ऐसी कितनी ही कलात्मक चीजोंकी बात सोची जा सकती है, जिनमें एक पैसा भी न Gandhi Heritage Portal
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