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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६९

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टिप्पणियाँ १३१ लगे या बहुत कम खर्च हो । इस तरह बेकार खादीके झंडे और पताकाएँ बनवाई जा सकती हैं। अब हम खादीके साथ खादीके कपड़ोंकी सिलाईकी विस्तृत व्यवस्था भी कर रहे हैं। दर्जीकी दुकानमें हमेशा ही खादीकी बहुत-सी बेकार कतरनें पड़ी रहती हैं। वह उन्हें फेंक देता है। इन बेकार कतरनोंका इस्तेमाल झंडियाँ और पताकाएँ बनानेके लिए किया जा सकता है। कागजकी झंडियां और पताकाएँ तो दूसरे ही दिन फेंक दी जाती हैं। मगर ये तो भविष्यमें काममें लानेके लिए भी रखी जा सकती हैं । मानपत्र हाथ से लिखें फूलोंकी मालाएँ बिलकुल छोड़ी जा सकती हैं और सूतकी मालाएँ भेंट की जा सकती हैं। किन्तु सूतमें गाँठें लगाकर उसे खराब नहीं किया जाना चाहिए। उसे जैसा- का तैसा ही दे देना चाहिए, जिससे बादमें उसका उपयोग कपड़ा बुननेमें या इसी तरह के किसी दूसरे काममें किया जा सके । मानपत्रोंको न छपाकर भी पैसा बचाया जा सकता है। संयोजकोंमेंसे जो सबसे सुन्दर अक्षर लिखते हों, वे हाथके बने कागजपर मानपत्र लिख दें और वह कागज खद्दरपर सफाईसे चिपकाया जा सकता है। अगर कोई छोटा लड़का या लड़की भी सूतसे खद्दरपर ही काढ़ दे तो और भी अच्छा । कढ़ाईके लिए सूत भी हाथकता होना चाहिए। ऐसी चीज कलात्मक और कीमती भी होगी। छपरा नगरपालिकाके अध्यक्ष बाबू महेन्द्रप्रसादने नगरपालिकाकी ओरसे मुझे जो मानपत्र भेंट किया था, उसे उनकी लड़की रमाने खद्दरपर बड़े अनूठे ढंगसे काढ़कर दिया था। मैंने यह कल्पना उसीसे ली है। इसमें नगरपालिकाको कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ा और मेरे पास एक ऐसी कलात्मक वस्तु हो गई जो गुजरात राष्ट्रीय विद्यालयमें अध्यापक मलकानी द्वारा बनाए संग्रहालयकी शोभा बढ़ायेगी । चाँदीकी मंजूषाएँ न दें [मानपत्रोंको] कीमती मंजूषाओं [ में रखकर ] देनेकी जरूरत नहीं है, क्योंकि ये मंजूषाएँ मेरे लिये किसी कामकी नहीं हैं। फिर उन्हें रखनेके लिए मेरे पास जगह भी नहीं है। मैं कुछ दिनोंसे उपहारमें मिली सभी कीमती मंजूषाओंको नीलाम कर देता हूँ और उनकी बिक्रीसे मिले धनको अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक कोष को दे देता हूँ । यद्यपि मुझे ऐसी नीलामी में बहुधा मंजूषाओंकी असली कीमत से अधिक पैसा मिल जाता है; तो भी अधिक दाम पानेके लिए ही इनका दिया जाना उचित नहीं होगा। अगर मानपत्र मंजूषामें रखकर ही देना हो, तो संयोजकोंके लिए अच्छी पद्धति यह होगी कि वे कोई सस्ती, सुन्दर ओर स्थानीय वस्तु ढूंढकर उसकी मंजूषा बनवायें । सैर-सपाटा नहीं गंगाधररावने बहुत ठीक ही कहा है कि मेरा यह दौरा सैर-सपाटेका दौरा नहीं है; बल्कि एक कामकाजी दौरा है और मैं आशा करता हूँ कि मैं इसमें अपने दरिद्रनारायणके लाभार्थं काफी ठोस कार्य कर लूंगा। इसलिए हरएक समारोह उसीके Gandhi Heritage Portal