१३२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय अनुरूप होना चाहिए। मैंने देखा है कि कामकी जरूरतके लिहाजसे जितने आदमी साथ होने चाहिए, उससे अधिक स्थानिक आदमी मेरे साथ चल देते हैं और कारें किराये पर लेने में उचित मितव्ययताका खयाल नहीं करते । खर्चकी हरएक मदपर पहलेसे सावधानीसे विचार कर लिया जाना चाहिए। जबतक हम ऐसा नहीं करते, भूखों मरनेवाले लाखों लोगोंके लिए हम कोई योग्य आर्थिक संस्था स्थापित नहीं कर सकते और छोटे पैमानेपर ही सही, हम भी उसी फिजूलखर्चीके दोषके भागी होंगे, जिसके लिए हम सरकारको उचित रूपसे दोषी ठहराते हैं । जहाँ कहीं सम्भव हो, किटसन लालटेनें नहीं लाई जानी चाहिए। मैं खाने-पीनेपर भी बहुत रुपया खर्च होता देखता हूँ। जो मेरे साथ घूमते हैं वे खातिर करवानेके लिए नहीं घूमते । स्वच्छ स्थान और स्वच्छ भोजनकी व्यवस्था हो, इतना ही काफी है। सचमुच कई बार मेरे मनमें आया है कि मैं और मेरे साथी अपना भोजन अपने साथ लेकर चलें और इस मामलेमें श्री भरूचाके अच्छे दृष्टान्तका अनुकरण करें, जो अपना भोजन अपने साथ ले जाने पर हमेशा जोर देते हैं । हम खाने-पीने में बहुत, बल्कि जरूरतसे अधिक, समय और रुपया खर्च करते हैं। मुझे लोगोंको कलकत्ते, बम्बईसे फलोंकी पार्सले मँगाते देखकर कष्ट होता है । यह बिलकुल व्यर्थका खर्च है । वेशक कुछ फल तो मेरे आहारका आवश्यक अंग हैं और वे जब हमें अपने यहाँ न मिल सकें तो बाहरसे मँगाने ही पड़ते हैं । मगर मुझे विश्वास है कि फलोंपर जितना पैसा खर्च किया जाता है, उसका कमसे- कम तीन चौथाई तो जरूर बचाया जा सकता है। मगर कुछ अति उत्साही मित्र कहते हैं, जो लोग आपसे प्रेम करते हैं, वे यदि कुछ ऐसी सेवा करके अपना प्रेम प्रकट करना चाहें तो क्यों न करें ? वे दूसरी तरह पैसा खर्च नहीं करेंगे और आपकी निजी सेवामें जितना खर्च करते हैं, उतना यों ही देंगे भी नहीं । इसलिए आप उन्हें अपनी सेवामें खर्च करनेका सुख उठाने दें। बेशक, यह दलील कानोंको तो अच्छी लगती है, मगर कायल कतई नहीं करती। सेवामें परिवर्तन जो लोग मुझसे प्रेम करते हैं, वे अगर मेरे सिद्धान्तसे भी प्रेम नहीं कर सकते तो उनका प्रेम अन्धा है और वह बहुत कीमती नहीं है । मैं नहीं समझता कि किसीका उद्देश्य केवल मित्रोंका मनोविनोद करना हो सकता है। मित्रताका अर्थ प्रेमभरी पारस्परिक सेवा है। कभी-कभी बहुत अधिक खातिर करके मित्रोंको प्रलोभनमें फँसाना तो अवश्य ही अहितकर होता है। अगर मेरे कोई मित्र ऐसे हैं जो मेरे सुखोपभोग के लिए तो रुपया पानीकी तरह बहाना चाहते हैं मगर जिस उद्देश्यको में प्यार करता हूँ, उसके लिए कुछ भी खर्च करना नहीं चाहते, तो उस सुखोपभोगसे बचना मेरा स्पष्ट कर्त्तव्य है। मित्रोंको अगर मित्रता निभानी है, तो उन्हें पहले मेरी जिन्दगीकी जरूरी चीजें जुटानी होंगी। वे उसके बाद ही मुझे सुखोपभोगकी चीजें भेजने की बात सोच सकते हैं, और खद्दरका काम मेरी जिन्दगी की सबसे बड़ी जरूरी चीज है । वह मेरे लिए खानेसे भी ज्यादा जरूरी है । स्वागत समितियाँ इस चीजको ध्यान में रखें । 1 Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७०
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