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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७१

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टिप्पणियाँ मालाओंकी नीलामी १३३ ये पिछले अनुच्छेद अहमदनगर पहुँचने के पहले जहाँ-जहाँ मैं रुका वहाँ-वहाँ लिखे गये अथवा बोलकर लिखाये गये थे । वहाँ एक बड़ी जबर्दस्त सभा हुई थी जिसमें मुझे कई मानपत्र दिये गये थे । नगरपालिकाका मानपत्र चांदीके एक सुन्दर गोलाकार डिब्बेमें रखकर दिया गया था। हर संस्थाके प्रतिनिधि फूलोंकी कीमती मालाएँ भी लाये थे । श्रीयुत फिरोदियाने थैली देते हुए उसमें छोटी रकम होनेके लिए क्षमा माँगते हुए यह बतलाया कि अहमदनगर अकालग्रस्त प्रदेश है । इसलिए जब मैंने उसका उत्तर दिया तो मैं महलोंके समान कोठियों, खर्चीले प्रबन्ध और अकालकी बातकी विसंगतिका उल्लेख किये बिना न रह सका। मैंने लोगोंसे कहा कि जो अहमदनगरकी दशा है वही सारे हिन्दुस्तानकी है। क्या सारा भारत अकाल-ग्रस्त नहीं है ? मगर इससे कुछ लोगोंका धन जमा करना तो नहीं रुका है। हम नगरनिवासी अकालग्रस्त गाँववालोंका ही शोषण करके जीते हैं। खद्दर आन्दोलनका अर्थ है इस बुराईका थोड़ा बहुत इलाज करना और उन लाखों लोगोंका थोड़ा-सा कर्ज चुकाना जिनका हम आज शोषण कर रहे हैं। इसलिए मैंने कहा कि इस सचाईको माननेसे कि अहमदनगर अकाल-ग्रस्त प्रदेश है, वहाँके धनियोंके लिए कम चन्दा देना नहीं, और भी अधिक चन्दा देना, दुगुना, लाजिमी हो जाता है। मैंने यह भी कहा कि उपहारके रूपमें ऐसी सुन्दर पेटियाँ और कीमती मालाएँ लेना मेरे लिये शोभनीय नहीं होगा । मैंने यह भी कहा कि मैं पौधोंको मनुष्यके समान ही प्राणवान् मानता हूँ; इस कारण मैं एक भी फूलका यों ही तोड़ा जाना पसन्द नहीं करता । मगर अहमदनगर जैसे स्थान में मेरी नापसन्दगी इस बातको याद करके और भी बढ़ जाती है कि मैं उन्हीं अकाल-ग्रस्तोंका स्वयंभू प्रतिनिधि हूँ, जिनका जिक्र श्रीयुत फिरोदियाने किया है । गैरजरूरी कामोंमें एक रुपया खर्च करनेका अर्थ है, १६ भूखी स्त्रियोंकी रोजी मारना । इसलिए मैंने सुझाया कि चाँदीकी पेटी और फूल नीलाम कर दिये जायें और मेरी बातका अगर कुछ भी असर पड़े तो खरीदार लोग इनका बाजार दाम न दें, बल्कि इससे जो भावना सम्बद्ध है उसको ध्यान में रखकर दाम दें। स्वभावतः ही नीलामका काम नगरपालिकाके अध्यक्ष खानबहादुर दोराब सेठको दिया गया। पेटी नगरके दानी सेठ मगनीरामको १००१ रु० में बेची गई और मालाएँ और गुलदस्ते उन्हीं योग्य प्रबन्धकों द्वारा विभिन्न लोगोंको ५०२ रुपये में बेचे गये। मेरी अपीलका असर केवल सभामें ही नहीं पड़ा बल्कि मुझे लगा कि वहाँके नागरिकोंने मेरे भाषणका भाव समझ लिया है क्योंकि १७०० रु० रुपयेकी थैली, जिसके लिए श्रीयुत फिरोदियाने माफी माँगी थी, बढ़ा कर करीब ६००० रुपयेकी कर दी गई। इसके अलावा सभामें खादी भी धड़ाधड़ बिकी। भविष्य के लिए प्रबन्धक इससे चेत जायें। मैं उन्हें सावधान करता हूँ कि उन्हें मालाएँ या कीमती पेटियाँ देने की जरूरत नहीं है। अगर वे देंगे तो मैं समक्षूंगा कि वे नीलाम करनेके लिए हैं और इसलिए हैं कि गरीबोंके कोष में उनका हिस्सा नीलामी द्वारा काफी बड़ा हो जाये । १. देखिए 'भाषण : अहमदनगर में ", १८-२-१९२७ ॥ Gandhi Heritage Portal