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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७४

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चि० प्रभावती, १२२. पत्र : प्रभावतीको [२६ फरवरी, १९२७ के पश्चात् ] तुमारा पत्र मीला है। क्या मेरा पत्र' जिसमें मैंने श्वसुरके साथ की मुलाकातका वर्णन दीया है नहि मीला है ? मार्च के अंतमें तुमको, विद्यावतीको और बन पड़े तो चन्द्रमुखी को पिताजी आश्रम भेजना चाहते हैं । 'रामायण' और 'गीताजी' का अभ्यास बढ़ा दो और चर्खा हरगीज न छोड़ो । चर्खा चलाते हुए रामधुन लगाना । तुलसी मेहरजी मुझको दुबारा मील गये । जिस प्रदेश में में अब घूम रहा हुं बड़ा रमणीय प्रदेश है। इसका नाम कोंकण है और महाराष्ट्रका एक हिस्सा है। मेरा भी इस प्रदेशमें यह पहला दौरा है । मेरी मुसाफरीकी तारीख पिताजीके पत्र में दी है। मूल (जी० एन० ३३२७) की फोटो नकलसे । १२३. एक मुमुक्षुकी महायात्रा । बापुके आशीर्वाद जब किसी आत्मार्थीका देहावसान होता है तब हम उसे महायात्रा ही कहते हैं । ज्ञानियोंने इस जगतको मुसाफिरखाना अथवा धर्मशाला माना है। हम इसमें दो दिन निवास करके चलते बनते हैं। 'गीता' ने देहको धर्मक्षेत्र कहा है । रणछोड़दास धारशी इस क्षेत्रका परित्याग करके कूच कर गये हैं। मैं उन्हें बहुत अच्छी तरह जानता था । वे आजकल कराची में रहा करते थे । वे श्रीमद् राजचंद्रके परमभक्त थे । रणछोड़भाईको उनके शिक्षण में पूर्ण आस्था थी । राजचंद्रभाईके नामका उल्लेख होते ही उनके नेत्रोंसे मैंने आनन्दाश्रु बहते देखे हैं। उनके परलोकवाससे उनके परिचित जनों और सम्पर्क में आनेवाले लोगोंको गहरा दुःख होगा । वे स्वयं तो कृतार्थ होकर चले गये । कराचीके सार्वजनिक जीवनमें वे अदृष्ट रहते हुए सदा भाग लिया करते थे । वे नामके भूखे न थे । उन्हें तो कामसे काम था। उन्हें खादीमें पूरी श्रद्धा थी और कराचीमें खादीका कार्य उत्साहसे किया करते थे। ईश्वर उनकी आत्माको शांति और उनके कुटुम्बियोंको सान्त्वना दे । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, २७-२-१९२७ १. गांधीजीका कोंकणका दौरा २६-२-१९२७ को आरम्भ हुआ था। २. देखिए " पत्र : प्रभावतीको २-२-१९२७ । Gandhi Heritage Portal