प्रिय मित्र, १२४. पत्र : लॉरा आई० फिंचको २७ फरवरी, १९२७ आपका पत्र मुझे साबरमतीसे यहाँ भेज दिया गया है। चूंकि मैं निरन्तर यात्रा कर रहा हूँ अतः बोलकर पत्र लिखवानेके लिए आप मुझे क्षमा करें। आप और श्रीमती ब्लेयर, जिन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूँ, दोनों जब कभी आश्रम जायें आप लोगोंका स्वागत होगा। मुझे आशा है कि ९ और १४ मार्चके बीच ज्यादातर में वहाँ रहूँगा । यदि आप उस समय आयें तो मुझे स्वयं आपका स्वागत करनेमें प्रसन्नता होगी । मेरी राय में आप और श्रीमती ब्लेयर अपने साथ मसहरी लेकर आयें। ऐसा नहीं कि आश्रम में मच्छर बहुत हैं, लेकिन यह देखते हुए कि आश्रम में हमारे पास मसहरियाँ नहीं हैं, पहलेसे ही तैयार होकर आना बुद्धिमानी है । अंग्रेजी (एस० एन० १२८१५) की माइक्रोफिल्मसे । १२५. पत्र : मीराबहनको हृदयसे आपका, मो० क० गांधी चि० मीरा, मालवन २८ फरवरी, १९२७ मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले । मेरे मनमें कोई सन्देह नहीं कि व्रतका जीवनमें वही महत्त्व है जो नौकाके लिए पतवारका । व्रत जीवनका नियामक है। जिस प्रकार पतवारके बिना नौका भटक जाती है उसी प्रकार व्रत-विहीन जीवन लक्ष्यभ्रष्ट जीवन है। क्योंकि आखिरकार व्रतका अर्थ है है -- जानकी भी बाजी लगाकर आत्मसंयमके निर्णयको निभानेका धार्मिक संकल्प । इसलिए किसी भी पुरुष या स्त्रीके लिए, जो कदाचित् सर्वोत्तम व्रत हो सकता है, ऐसे व्रतको ग्रहण करनेकी तुम्हारी इच्छाका मुझे स्वागत करना चाहिए । पर यदि व्रत लेना है तो खूब सोचविचार करनेके बाद लेना चाहिए। यदि तुम इस व्रतको लेनेकी आवश्यकता स्पष्ट रूपमें अनुभव करती हो, तो तुम्हें व्रत लेनेसे रोकना मेरे लिए ठीक नहीं होगा । व्रत न लेनेका अर्थ है अपने शुद्ध 'स्व' पर विश्वास करना । व्रत लेनेका अर्थ है अपने आपपर विश्वासका न होना और केवल ईश्वरपर विश्वास करना। मैं जानता हूँ कि जो व्रत मैंने लिये हैं, यदि वे मैंने न लिये होते तो आज मेरी क्या स्थिति होती । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७५
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