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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७६

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१३८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय पर इसका एक और पहलू भी है अर्थात् एन्ड्रयूजवाला। उनका कहना है " में नहीं जानता कि अन्तरात्माकी आवाज सदैव ईश्वरकी आवाज ही होती है। जो मैं आज सही मानता हूँ, कल गलत भी साबित हो सकता है। इसलिए मुझे अपनी आत्माको ऐसा शुद्ध और मुक्त रखना चाहिए कि पल-पल जैसी ईश्वरेच्छाकी प्रतीति हो उसीके अनुकूल आचरण कर सकूँ।" इस रवैयेसे उनका काम तो चल गया है। पर मैं तो कहींका न रहूँगा । मुझे तो एन्ड्रयूजके तर्कके पीछे वाक्छल दिखाई देता है; उन्हें नहीं । इसलिए इस तर्कसे उन्हें सहारा मिलता है । भ्रान्ति, भूल आदि सापेक्ष शब्द हैं । यद्यपि सत्य सर्वदा एक ही रहता है, फिर भी हो सकता है कि जो बात एकके लिए अच्छी है, वह सबके लिए अच्छी न हो। अतएव कठिनाईकी बात है, सत्य विषयक हमारा निराशाजनक अज्ञान । निष्ठुर विधाताने हमें यह समझने की शक्ति तो दी है कि सत्य एक है, उससे परे कुछ नहीं है । परन्तु हमें इतनी शक्ति नहीं दी कि हम सत्यका रहस्य जान सकें । इसलिए यदि तुम्हारी अन्तरात्मा तुम्हें व्रत लेनेकी प्रेरणा देती हो, और तुम्हें ऐसा लगता हो कि व्रत लेनेपर तुम अधिक स्वतन्त्रताका अनुभव करोगी, तो तुम्हें व्रत लेना ही चाहिए। जल्दबाजीमें कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं । तुम्हें अपना स्वास्थ्य सँभालकर रखना चाहिये । निश्चय ही जब कभी थोड़ासा भी भारीपन या बदहजमीका अनुभव हो, तो उपवास रखना चाहिए। बदहजमी या थोड़ा भी भारीपन महसूस हो और उसके साथ शक्ति भी मालूम दे तो ऐसी शक्ति से कमजोरी ज्यादा अच्छी । तुम्हें अपनी हिन्दीके बारेमें चिन्ता नहीं करनी चाहिए। तुम जो कुछ कर सकती हो, कर रही हो । बाकी ईश्वरके हाथमें रहने देना चाहिए। जब हम मिलेंगे, तब शायद कुछ परिवर्तन करना जरूरी होगा। यह बात तो स्पष्ट है कि तुम्हें हिन्दी सीखना और चरखा सिखाना दोनों काम एक साथ नहीं करने चाहिए। जाहिर है कि इससे तुम थक जाती हो। तुम्हें जितनी सहायताकी जरूरत थी, उतनी सहायता नहीं मिल पाई है। फिर भी तुमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, वे अमूल्य हैं और में उनसे सन्तुष्ट हूँ । मुझे रामचन्द्रका पत्र अभी मिला है। मुझे यह देखना है कि वहाँ आनेपर क्या किया जा सकता है । सस्नेह, [ पुनश्च : ] मुझे इस महत्त्वपूर्ण पत्रको दोहराने का भी समय नहीं है । अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५२०७ ) से । सौजन्य : मीराबहन तुम्हारा, बापू Gandhi Heritage Portal