बहनो, १२६. पत्र : आश्रमकी बहनोंको मालवन माघ वदी ११ [ २८ फरवरी, १९२७ ] अब मुझे तुम्हारे नाम यह एक ही पत्र भेजना रह गया है। अगले सोमवारको तो मैं तुम्हारे पास आनेके लिए रवाना हो जाऊँगा । सफर में स्त्रियोंकी सभाएँ होती ही हैं। इसलिए नित नये अनुभव मिलते रहते हैं। मैं देख रहा हूँ कि स्वराज्यकी कुंजी स्त्रियोंके पास है, परन्तु उन्हें जाग्रत कौन करे ? असंख्य स्त्रियाँ ऐसी हैं जिन्हें कोई काम नहीं है, उन्हें कौन उद्यमी बनाये ? माताएँ बचपनसे ही अपने बालकोंको बिगाड़ती हैं, उन्हें कौन रोके ? वे अपने बालकोंको गहनों और अनेक प्रकारके कपड़ोंसे लादे रहती हैं; छोटी-छोटी बालिकाओंका ब्याह रचा देती हैं; बालिकाएँ बूढ़ोंको ब्याह दी जाती हैं। स्त्रियोंके गहने देखकर तो में हैरान हो जाता हूँ । उन्हें कौन समझाये कि गहनोंमें सौन्दर्य नहीं, सौन्दर्य तो हृदयमें है ? ऐसी तो कई बातें में लिख सकता हूँ, मगर उनका उपाय क्या है ? उपाय तो तभी हो सकता है जब स्त्रियोंमें से कोई द्रौपदी-जैसी उग्र तेजवाली निकल पड़े। ऐसी शक्ति प्राप्त करनेकी कोशिश करना तुम्हारा काम है। उसे प्राप्त करनेका निश्चय करना और फिर धीरज रखना। जल्दी करनेसे काम नहीं सरता । गुजराती (जी० एन० ३६४१ ) की फोटो- नकलसे । १२७. पत्र : ना० मो० खरेको बापूके आशीर्वाद मालवन सोमवार [ २८ फरवरी, १९२७] भाई पण्डितजी, नानाभाईका जो पत्र मैंने चि० मणिलालको भेजा है उसे पढ़ लेना । यदि समय मिल सके तो नानाभाईकी प्रसन्नताके लिए एक दिन जल्दी पहुँचना । विधि तो हमें अत्यन्त संक्षेपमें करनी है। इस क्रियामें एक घंटे से ज्यादा समय न लगे, ऐसा निश्चित कर लेना । तथापि जरूरी सभी कुछ अवश्य करना । प्रतिज्ञाकी दो प्रतियाँ बनवाना, दोनों को एक-एक देनेके लिए। तुम्हारे और मेरे भाग्यमें अब ऐसे विवाह कराना ही रहा है। अन्य मित्र जो चाहेंगे उससे तो हम उन्हें रोक नहीं सकते । यह क्रिया आदि सारी विधि इसी कारण है, इसपर अच्छी तरहसे विचार करके Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७७
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