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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७९

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पत्र : नानाभाई इ० मशरूवालाको १४१ विवाह एक नया जीवन है, यह मैं जानता हूँ । इसलिए चाहे मुझे तुम्हें विस्तारपूर्वक लिखनेके लिए अधिक समय नहीं मिलता फिर भी मेरे मनमें तुम्हारा विचार सदा बना रहता है । तुम अकोला में रहोगे तो भी मुझे तो वहाँसे सोमवारको चल ही देना होगा । आश्रम में मैंने अपने लिए बहुत ज्यादा काम तैयार कर रखा है । तुम्हें मुझसे जो कुछ कहना सुनना हो उसे ठीकसे लिख कर रख लेना क्योंकि सम्भव है कि इसके बाद हम फिर न मिलें। यह भी हो सकता है कि हम इस जीवनमें फिर न मिल पायें। तुम मार्चमें जब दक्षिण आफ्रिका जाओगे उस समय में न मालूम कहाँ भटक रहा होऊँगा । इसलिए मैं देखता हूँ कि तुम्हें जो- कुछ पूछना हो, उसे पूछनेका अवसर तुम्हें ज्यादातर गाड़ी में मिलेगा। रविवारको तो हम विवाहकी धूमधाममें व्यस्त होंगे। वैसे, मैं उम्मीद तो यह करता हूँ कि धूमधाम जैसा कुछ नहीं होगा, जो होगा सो केवल धार्मिक वातावरण तैयार करनेके लिए होगा और शान्ति भी काफी रहेगी। फिर भी मैं कामकाजी व्यक्ति ठहरा, इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि हमें समय न मिले । नानाभाईने पत्र में पण्डितजीके एक दिन पहले आनेकी माँग की है। अगर पण्डितजी जा सकें तो जायें । यद्यपि मैंने नानाभाईको लिख दिया है कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि वह एक दिन और दे सकें तो जरूर दें । आना । | तुम 'गीता' की दो प्रतियाँ, दो प्रतियाँ ' भजनावलि' की तथा दो तकलियाँ लेते बापूके आशीर्वाद गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२४ ) से । सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी १२९. पत्र : नानाभाई इ० मशरूवालाको भाईश्री ५ नानाभाई, [ २८ फरवरी, १९२७] आपका पत्र मिला । आपने पण्डितजीके जल्दी आनेकी जो बात लिखी है सो उसकी कोई जरूरत तो नहीं है। फिर भी मैंने उन्हें लिख दिया है कि यदि एक दिन पहले पहुँच सकें तो अवश्य पहुँचें । उम्मीद है, आप किसी तरहका आडम्बर अथवा सजावट आदि नहीं करेंगे । मण्डप आदिका खर्च कमसे कम करेंगे। विवाह-विधि खुली हवामें करना ठीक जान पड़ता है । केवल छाया हो; इतना ही काफी है । । १. पण्डितजीके उल्लेखसे; देखिए पिछला शीर्षक । २. देखिए "पत्र : ना० मो० खरेको", २८-२-१९२७ । Gandhi Heritage Portal