१४२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय आपके घरमें धार्मिक वातावरण तो है ही, लेकिन मेरी इच्छा है कि इन दिनों विशेष रूपसे हो । [ पुनश्च बापूके आशीर्वाद मैंने मणिलालको लिखा है कि यदि बन सके तो वह चन्द दिन अकोलामें रहे । यदि वह वहाँ रहेगा तो कदाचित् दोनोंको अलगसे एक कमरा देनेकी आवश्यकता होगी। विवाह के तुरन्त बाद वे दोनों थोड़े दिन साथ रहें, यह शायद आवश्यक है । ११२९) से । गुजराती (सी० डब्ल्यू० सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी चि० सुशीला, १३०. पत्र : सुशीलाबहन मशरूवालाको सोमवार [ २८ फरवरी, १९२७] तुम्हारा बहुत सोच-सोचकर लिखा हुआ पत्र इतने दिनोंके बाद आया; मगर आया तो सही। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे निस्संकोच होकर लिखनेकी आदत डालो । । रविवारके दिन तुम्हें, मणिलालको, नानाभाईको, विजयालक्ष्मीको, मुझे तथा बा को विवाह - विधि पूरी होनेतक अर्थात् १२ बजेतक, उपवास करना होगा। वह सारा समय तुम धर्म-चिन्तन और विवाहका अर्थ समझने में बिताना। विवाह भोगके लिए नहीं, संयमके लिए है, इस बातको आजकल तो लोग बिलकुल ही भूल गये हैं । आदमी • स्त्री-पुरुष - जब विकारवश होते हैं तब उस विकारको नियमित रखने, उसे मर्यादामें बाँधनेके लिए विवाह-सम्बन्ध करते हैं। हममें और पशुओंमें यही भेद है। इस तरह यद्यपि विवाह विषय-भोगका अवसर देता है तथापि शास्त्रमें यह कहा गया है कि दम्पतीका धर्म है कि वे विषय-भोगको उत्तरोत्तर कम करते जायें। भोगार्थं रचे गये दाम्पत्य सम्बन्धको भी शास्त्र मोक्षार्थ उपयोग करनेका प्रयत्न करते हैं और उनका यही आदेश है । और वह भी इस हदतक कि मुमुक्षुओंने आत्मा और परमात्माके सम्बन्धको भी विवाह रूपमें वर्णित किया है। दाम्पत्य प्रेमके विषयमें जिस शुद्ध अद्वैतकी कल्पना की गई है वही कल्पना आत्मा और परमात्माके अद्वैतके सम्बन्धमें भी की गई है। इस तरह विवाह समाज-सेवाका एक बहुत बड़ा साधन बन सकता है। भगवान करे कि तुम्हारे विवाहके सम्बन्धमें भी यही बात चरितार्थ हो । १. देखिए पिछला शीर्षक । २. पत्र में विवाह प्रतिज्ञाको चर्चाके आधारपर देखिए " पत्र: मणिलाल गांधीको", २८-२-१९२७ और " पत्र : ना० मो० खरेको", २८-२-१९२७ ॥ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८०
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