१४१. भाषण : वैश्य विद्याश्रमको व्यायामशालामें' [४ मार्च, १९२७ ] प्रातःकाल गांधीजीने व्यायामशालामें हनुमानजीको मूर्तिके प्रतिष्ठापन सम्बन्धी उत्सवका उद्घाटन किया। उन्होंने कहा : मैं मरुतसुत हनुमानजीकी मूर्तिका प्रतिष्ठापन यहाँ केवल इसीलिए नहीं कर रहा हूँ कि वे बल और पराक्रममें बहुत बढ़े चढ़े थे । बल और पराक्रम तो रावणमें भी था । मारुतिमें आत्मबल प्रधान था । उनका शरीरबल तो उनके आत्मबलका ही द्योतक था, और आत्मबल, उनके नैष्ठिक ब्रह्मचर्य तथा रामजीके प्रति उनके अनन्य प्रेमका सीधा प्रतिफल था । उस ईश्वरसे मेरी प्रार्थना है कि वह आप सबमें हनुमानके अद्वितीय पराक्रमका जो आपके ब्रह्मचर्य व्रत पालनसे आ सकता है, प्रादुर्भाव हो और ईश्वर करे आपका वह पराक्रम देशसेवाके लिए अर्पित हो । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १७-३-१९२७ १४२. भाषण : पूनामें [४ मार्च, १९२७]' गांधीजीने अपना महाराष्ट्रका दौरा समाप्त करते हुए रे मार्केटमें एक सार्व- जनिक सभामें भाषण दिया। उन्होंने कहा : हनुमानने अपनी छाती चीरकर दिखला दिया था कि उसमें रामनामके सिवा और कुछ नहीं है । मुझमें अपना हृदय चीरकर दिखानेकी हनुमान जैसी शक्ति नहीं है; मगर आपमें से कोई देखना ही चाहे तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि आपको उसमें सिवा रामके प्रेमके और कुछ नहीं मिलेगा। मुझे उस रामका साक्षात् दर्शन हिन्दुस्तानके करोड़ों भूखे लोगों में होता है । गांधीजीने लगभग आधी रातके समय छात्रोंकी सभा [ भाषण दिया ] । ... छात्रोंकी ओरसे 'अंग्रेजी' 'अंग्रेजी' की पुकार सुननेमें आई। उन्हें इससे बहुत दुःख हुआ; किन्तु उन्होंने छात्रोंके प्रति अगाध प्रेमके कारण अंग्रेजीमें बोलना स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा : १. महादेव देसाईकी " साप्ताहिक चिट्ठी " से । २. महादेव देसाईंकी “साप्ताहिक चिठ्ठी " से । ३. बॉम्बे क्रॉनिकल, ११-३-१९२७ से । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९३
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