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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१९४

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१५६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय यदि मैं अपनी बात पूनाके विद्यार्थियोंको न समझा सकूं तो यह मेरा दुर्भाग्य है, मेरे देशका दुर्भाग्य है और आपका भी दुर्भाग्य है । मगर उन्होंने छात्रोंके अंग्रेजीमें बोलनेके आग्रहको इतना ही माना कि सभामें देरसे आनेके लिए खेद अंग्रेजीमें व्यक्त किया। पीछे यह देखकर कि लोग उनका भाषण ध्यानसे सुनने लगे हैं, वे हिन्दीमें बोले। उन्होंने कहा : सम्भव है अंग्रेजीमें अपनी बात कहनेसे मुझे आपसे कुछ अधिक मिल जाता और हो सकता है आप मेरी बात अधिक अच्छी तरह समझ पाते । मगर मैं अपने सन्देशको, स्वयं अपनेसे और अभिव्यक्तिके साधनसे भी कहीं अधिक ऊँचा मानता हूँ । इसकी खास अपनी एक निराली ताकत है और में आशा करता हूँ कि हिन्दुस्तानके नौजवानोंपर इसका असर पड़ेगा। मेरे जीते जी इसका असर पड़े या न पड़े - इसकी मुझे कोई परवाह नहीं। मगर मेरा विश्वास अटल है, और ज्यों-ज्यों दिन बीतते जायेंगे और जनताके कष्टोंकी अवधि बढ़ती जायेगी, यह सन्देश हरएक देशभक्त भारतीयके हृदयमें देदीप्यमान होता जायेगा। आपको समझ लेना होगा कि इस उम्र में, जबकि मुझे जिन्दगी-भर मेहनत करनेके बाद आराम करना चाहिए था, मैं देशके एक छोरसे दूसरे छोरतक बिना मतलब यों ही चक्कर नहीं काट रहा हूँ। इसका कारण यह है कि मेरे मनमें यह विश्वास अधिकाधिक दृढ़ होता जा रहा है कि में मरते दमतक ज्यादासे ज्यादा, जितने लोगोंतक यह सन्देश पहुँचा सकूं, पहुँचानेका प्रयत्न करूँ । इसके बाद उन्होंने चरखा आन्दोलनका संक्षिप्त विवरण दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने उसकी कल्पना काफी पहले १९०८ में जब उन्होंने वास्तवमें चरखा देखा भी नहीं था, तभी कर ली थी। गांधीजीने विद्यार्थियोंका ध्यान उन लोगोंके प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करनेकी ओर दिलाया जिनके नैतिक और आर्थिक विनाशके मूल्यपर वे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा : आप चाहें तो यह शिक्षा प्राप्त करते रहें, मगर कमसे कम उन्हें इसका कोई उपयुक्त बदला तो दें। मैं जानता हूँ कि आपने खादीको नहीं अपनाया है। इसका कारण यह नहीं है कि आपकी मनोवृत्ति उलटी है, बल्कि आपको इसका यकीन नहीं कि गरीबी और बेकारी, जिसके औचित्यके बारेमें में पुकार-पुकार कर कह रहा हूँ, कोई भयंकर समस्या है। श्याम देशके राजाको लॉर्ड कर्जनकी इस बातपर विश्वास नहीं हुआ था कि वे ऐसे देशसे आए हैं, जहाँ वर्षमें कुछ महीने नदियोंमें पानी जमा रहता है । में विश्वास दिलाता हूँ कि हमारे देशमें ३० करोड़ आदमियोंको दिनमें एक वक्तका भी खाना भर-पेट नहीं मिलता; यह स्थिति मैंने अपनी आँखोंसे देखी है । भाषणका शेष अंश ब्रह्मचर्य से सम्बन्धित था। यह ऐसा विषय है कि जब भी गांधीजी विद्यार्थियोंके मध्य होते हैं उनकी जबानपर आ ही जाता है। उन्होंने ब्रह्मचर्यके महत्त्वको समझाते हुए कहा : Gandhi Heritage Portal