१४४. पत्र: मीराबहनको
७ मार्च, १९२७
अभी सुबह-सवेरा ही समझो। मैं, बा, मणिलालकी पत्नी सुशीला, मणिलाल, रामदास, महादेव और पंडितजीके साथ भुसावलमें एक तीसरे दर्जे के डिब्बेमें बैठा हूँ। ये सब लोग विवाह-संस्कार कराने आये थे विवाह बहुत ही सादगीसे किया गया। उसमें कोई भेंट नहीं ली गई और कोई खर्च नहीं किया गया।
एक दिन और मिल जाये, इस खयालसे मैंने अपने मौनवारको यात्रा करनेका निश्चय किया है। में तीसरे दर्जे में यात्रा इसलिए कर रहा हूँ कि मणिलाल और उसकी बहू के लिए दूसरे दर्जेका किराया खर्च नहीं किया जाना चाहिए, और में नहीं चाहता कि परिवारके नये सदस्यसे परिवारमें शरीक होनेके पहले ही दिन जुदा हो जाऊँ चूंकि मैं आगे आश्रममें आरामसे लगभग छः दिन रह सकता हूँ और तीसरे दर्जे का यह सफर बड़े आरामका है, मुझे कोई परेशानी नहीं लग रही है; बल्कि इसमें मुझे आनन्द आ रहा है।
आश्रम पहुँचनेपर में 'आत्मकथा' में तुमने जो संशोधन किए हैं उन्हें पढ़ेगा। मैंने पहले ही समझ लिया था कि जिन अध्यायोंको तुमने पहले नहीं देखा है, उनमें तुम बहुत संशोधन करोगी।
तुम्हारा,
बापू
सौजन्य: मीराबहन