१४६. पर्ची: मणिलाल गांधीको[१]
[७ मार्च, १९२७][२]
अब तुम्हारा विवाह करा दिया; तुम दोनोंकी जान-पहचान भी करवा दी है। अब अपना घर तो तुम्हें ही चलाना पड़ेगा। सुशीलाके पास जाकर बैठो। उसके पास क्या क्या कपड़े हैं इसकी जानकारी करो, उसकी इच्छाको जानो और बादमें जो चीजें बनवानी हों उन्हें नोट कर लो। इस तरह झिझक निकल जायेगी और एक काम भी हो जायेगा। या चाहो तो कुछ और बात कर सकते हो। या जहाँ तुम हो वहाँ सुशीलाको बुलवाकर अन्य लोगोंको वहाँसे...[३]विदा करा दूँ।
१४७. अस्पृश्यता, स्त्रियाँ और स्वराज्य
श्रीमती सुहासिनी देवीका पत्र[४] में खुशीसे छाप रहा हूँ पाठक उसे किसी अन्य स्तम्भमें प्रकाशित पायेंगे। यद्यपि कांग्रेसके प्रतिभावान सभापति [५]अपना बचाव करनेमें स्वयं समर्थ हैं, परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि मुझे पत्र लिखनेवाली इस बनने अपने थोड़ेसे अनुभवके ही आधारपर जरूरतसे ज्यादा सामान्यानुमान निकाल लिये हैं। अस्पृश्यता निवारणके आन्दोलनकी महान प्रगति सिद्ध करनेके लिए किन्हीं आँकड़ोंकी जरूरत नहीं है। अस्पृश्यताकी दीवार हर जगह ढह रही है। हर सूबेमें ऊँचे वर्गोंके लोग दलित जातिके बच्चोंके लिए स्कूल छात्रावास आदि चलाकर उस रूपमें दलित जातिके लोगोंकी आवश्यकताएँ पूरी करते हुए मिल सकते हैं। लगता है कि यही चीज सभापति महोदयके मनमें थी, जब अपने भाषण में उन्होंने इसका जिक्र किया था। खैर जो कुछ अभीतक हो सका है, उससे असंख्य गुना ज्यादा करना अभी बाकी है। स्त्रियोंके पूर्वाग्रहको दूर करनेका सवाल सबसे कठिन काम है। वस्तुतः यह स्त्री-शिक्षाका सवाल है। और इस विषयमें यह सवाल केवल लड़कियोंकी ही शिक्षाका नहीं है बल्कि विवाहित स्त्रियोंकी शिक्षाका भी है। इसलिए मैंने बार-बार यह बात
- ↑ गांधीजीने इसे मौनवारको लिखा था।
- ↑ लगता है कि यह पर्ची मणिलालके विवाहके दूसरे दिन ७ मार्च, १९२७ को लिखी गई होगी।
- ↑ साधन-सूत्र के अनुसार।
- ↑ इस पत्रमें लेखिकाने इस बातकी शिकायत की थी कि अस्पृश्यता निवारणके विषयमें कोई ठोस कदम उस हदतक नहीं उठाया जा रहा है जिस हदतक कांग्रेसके प्रस्ताव तलब कर रहे हैं।
- ↑ एस० श्रीनिवास आयंगार।