१४८. प्रवर्तक तरुण बंगाल संघ और खादी फिलहाल इस समय बंगालके जैसा पीड़ित दूसरा प्रान्त नहीं है । इसके कुछ अच्छेसे अच्छे नवयुवक जेलोंमें पड़े सड़ रहे हैं और उन्हें इसका कारण भी मालूम नहीं । कांग्रेसियोंमें भी फूट है । देशबन्धुके बाद बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी किसीको अपना एकमात्र नेता स्वीकार नहीं कर पाई है। इसमें ताज्जुबकी कोई बात नहीं है । देशबन्धु जैसे तो केवल वे ही हो सकते थे । मगर इस सबके होते हुए भी बंगालमें रचनात्मक कार्य लगभग निरन्तर चल रहा है। इस काम में लगे हुए निःस्वार्थ भावसे सेवा करनेवाले नवयुवकोंकी संख्या दिन-दिन बढ़ती ही जा रही है । श्रीयुत मोतीलाल रायके नेतृत्वमें बंगालका प्रवर्तक संघ, जिसका प्रधान कार्यालय चन्द्रनगरमें है, खादी तैयार करने और बेचनेका अपना काम बराबर बढ़ाता जा रहा है। मगर अबतक संघमें खादीका काम एक पूरक काम ही रहा है – उसके कई बड़े-बड़े कामोंमें से यह भी एक छोटासा काम है । मगर अब मोतीबाबूने खादीके कामको अपने संघका मुख्य कार्य बनानेका दृढ़ निश्चय कर लिया है। उनसे मैंने खुद इसके बारेमें बहुत देरतक बात की थी और उन्होंने कहा था कि उनके दिलमें यह धारणा बलात् घर करती जा रही है कि चरखेको केन्द्र बिन्दु बनाये बिना जनसमूहकी सच्ची सेवा कर पाना असम्भव है । सर्वश्री बैंकर और लक्ष्मीदास मेरे बाद चन्द्रनगर गये । और उन्होंने मुझे कुतुबदियामें चरखेके प्रति संघके उत्साहका और उसके [खादी] कार्यका बहुत ही रोचक वर्णन भेजा है। उन्होंने मुझे यह भी बतलाया कि कताई और धुनाईके काममें हो रहे नए-नए सुधारोंको सीखनेके लिए मोतीबाबू कितने उत्कंठित हैं । यह संघ अपेक्षाकृत एक पुरानी संस्था है। इसकी मूल प्रेरणा पांडिचेरीके तपस्वीसे मिली है और बंगालमें इसके कितने ही निःस्वार्थ और श्रद्धालु कार्यकर्त्ता हैं । मेरे सामने उनके जनवरी मासकी खादीके जो आंकड़े हैं उन्हें देखनेसे पता चलता है कि इस महीने में उन्होंने ७०० रु० से ऊपरकी खादी बनाई और ३४०० रु० से अधिककी बिक्री की। अगर यह संघ खादीका उत्पादन करनेमें अपनी शक्ति केन्द्रित कर सके तो वह बहुत जल्दी ही खादी प्रतिष्ठान और अभय आश्रमकी, उनके कार्यमें बाधा डाले बिना, बराबरी करने लगेगा। क्योंकि अगर हरएक नया संघ अपने लिए नया क्षेत्र ढूंढ ले और उसीमें काम करता रहे तो फिर खादीके उत्पादन और विक्री दोनों हीके लिए प्रायः असीम क्षेत्र है । बंगाल जैसे विशाल प्रान्तकी माँगें पूरी करना किसी एक संस्थाके लिए असम्भव है । [अंग्रेजीसे] यंग इंडिया, १०-३-१९२७ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२००
दिखावट