१६८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय यदि पाठकोंको हरिजनोंसे जरा भी सहानुभूति होगी तो वे इसे पढ़ना आरम्भ करनेके बाद समाप्त किये बिना छोड़ ही न सकेंगे। इस लेखकी प्रत्येक पंक्तिसे दलितोंके प्रति लेखकका प्रेम टपकता है । यदि हम उनके इस प्रेमकी कुछ बूंदे भी ग्रहण करके अपने हृदयको आर्द्र होने देंगे तो दलितोंका तथा हमारा दोनोंका ही दुःख दूर हो जायेगा । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, १३-३-१९२७ १५५. पत्र : मीराबहनको [ १४ मार्च, १९२७] चि० मीरा, मुझे तुम्हारे सब पत्र मिल गये हैं । आश्रमवासकी मेरी थोड़ी-सी अवधिका यह अन्तिम दिन है । हम जल्दी ही मिलेंगे, इसलिए तुम्हें लम्बा स्नेह-पत्र लिखनेकी कोई जरूरत नहीं है । तुम्हें अपनी खोई हुई सेहत फिर हासिल कर लेनी चाहिए। तुम्हें वहाँ बहुत कटु अनुभव हुए हैं और तुम हिन्दी में बहुत कम प्रगति कर सकी हो, इसके बावजूद मुझे तुम्हारे वहाँ जानेका दुःख नहीं है । मेरा १९ तारीखसे पहले वहाँ पहुँचना असम्भव है, क्योंकि मैं एक दलित वर्ग सम्मेलनसे १७ तारीखको ही निवृत्त हो सकूंगा। अगर में सम्मेलनकी तारीखें बदल सकता, तो आश्रम में खुशीसे एक दिन कम ठहरता। मगर उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। अब मैंने सुझाया है कि अगर हरिद्वारके लोगोंको खादी प्रदर्शनीका उद्घाटन करानेके लिये कोई दूसरा व्यक्ति न मिले तो वे उसका उद्घाटन वा या महादेवसे करा लें । मुझे पूरी उम्मीद है कि कलकत्तेसे चरखा आ गया होगा । क्या मैंने तुम्हें बताया कि मेरा वजन ५ पौंड और बढ़ गया है ? जिस दिन मैं यहाँ पहुँचा, उस दिन मेरा वजन लगभग १०८ पौंड था। यह बहुत अच्छी बात है । आज शामको मेरा वजन फिर लिया जायेगा । सस्नेह, अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५२०९) से । सौजन्य : मीराबहन १. बापूज लैटर्स टु मीरासे । २. गुरुकुल कांगड़ी। बापू Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२०६
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