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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२१२

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१७४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय है । बनियों और पारसियोंके कारण ही तो उन्हें यह [तिरस्कार सूचक] नाम मिला है। लेकिन व्यवसायकी दृष्टिसे पारसी भी बनिये ही हैं। उन्होंने अपनी वणिक्-बुद्धि और व्यापारके बलपर ही संसार भरमें नाम कमाया है। मैं जानता हूँ कि वणिक्के बिना संसार नहीं चल सकता, पर यह तो शामल भट्ट द्वारा वर्णित सच्चे वणिक्के बिना । लेकिन आज तो ऐसे अनेक वणिक् हैं जो सदा एक रुपयेके दो बनानेके विचारमें लीन रहते हैं और पैसेके लिए स्त्री, माता, पिता और आत्माको बेचनेके लिए भी तैयार हो जाते हैं। मेरा मन चाहता है कि उनसे दूर भागकर मैं आपके बीच आकर रहने लगूं। नहीं रहता तो केवल इस मोहके कारण कि शायद बाहर रहकर में थोड़ी बहुत सेवा कर सकता हूँ, अपनी शक्तिका उपयोग कर सकता हूँ । परन्तु में नहीं रहता तो भी मुझे इतना आश्वासन तो है ही कि मेरे साथी आपके बीच रहते हैं । कौन काला है, कौन गोरा है ? हम सभी एक ही स्याहीके बने चित्र हैं । परमात्माकी एक ही कलम है। ईश्वर अलग-अलग कलम लेकर नहीं लिखता । जंगलमें सिंह और सिंहनी रहते हैं। आप भाई-बहन भी उनकी तरह बनें, जिससे कोई आपको लूट न सके, कोई सता न सके, कोई अपवित्र न कर सके ? 'रानीपरज ' यानी जंगलवासी । जंगलमें वही घूम सकता है जो ऋषि हो या लुटेरा हो; या फिर सिंहादि हिंसक पशु घूम सकते हैं। आप न हिंसक पशु हैं न लुटेरे । तो आपको ऋषि बनना है । शहरोंकी दुर्गन्धपूर्ण नालियों, शराबकी दुकानों, सूरतके भोजन-प्रिय निवासियों की तीव्र गन्धवाली साग-सब्जियों और सेव भजियासे आप दूर हैं और दूर ही रहें। आप सचमुच जंगलवासी बनें तो मेरे जैसे दुबले, निर्बल आपके पास रक्षण माँगने आयेंगे। आज हम शहरवासी खानेके लिए ही जी रहे हैं। इसलिए आप हमें जीनेके लिए खानेकी कला सिखाइये। आप जंगलों में वेदोच्चार कीजिए, जंगलोंको पवित्र बनाइये, हिंसक पशुओंको वहाँसे बाहर निकालिए या उन्हें वासुदेवमय जगतका साक्षात्कार कराके रामनामके मन्त्रसे वशमें कर डालिये । अंतमें मैं बहनोंसे इतना ही कहूँगा कि आपने खादी पहनना शुरू कर दिया है, यह बहुत अच्छा किया। अब आप इन भद्दे गहनोंको भी छोड़ दें जो आपके नाक-कान आदिको कुरूप बना देते हैं, जिनमें मैल जमा होता रहता है और जो गुलामीके तमगे हैं। [ गुजरातीसे ] नवजीवन, २०-३-१९२७ १. अंतिम अनुच्छेद यंग इंडिया, २४-३-१९२७ से लिया गया है। Gandhi Heritage Portal