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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२१८

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१८० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय भी हो इस सम्मानसे मैं अपना सिर नीचा हुआ कदापि नहीं मानता। मुझे श्री टाटा दयालु और सौजन्यपूर्ण मालिक मालूम हुए। में समझता हूँ कि कर्मचारियोंकी सभी प्रार्थनाएँ उन्होंने सहज ही स्वीकार कर लीं और मुझे बादमें यह मालूम हुआ कि उस समझौतेका पालन भी ठीकसे किया जा रहा है। मैं अपने कामके लिए धनिकों और गरीबोंसे भी दान माँगता और लेता रहता हूँ । धनी लोग खुशीसे मुझे दान देते हैं । यह कोई व्यक्तिगत विजयकी बात नहीं है । यह अहिसाकी विजय है, जिसका मैं ही, अपूर्ण रीतिसे ही क्यों न हो, प्रतिनिधित्व करनेकी कोशिश करता हूँ, फिर यह प्रतिनिधित्व में कितने ही अपर्याप्तरूपसे क्यों न करता होऊँ। मेरे लिए यह स्थायी रूपसे व्यक्तिगत सन्तोषकी बात है कि सामान्यतया मुझपर उन लोगोंका भी प्रेम और विश्वास कायम रहता है, जिनके सिद्धान्तों और नीतियोंका में विरोध करता हूँ । दक्षिण आफ्रिकाके लोगोंने खुद मुझपर विश्वास किया और मेरे प्रति मंत्री वरती । ब्रिटिश नीति और ब्रिटिश सरकारकी निन्दा करते रहनेके बावजूद भी हजारों अंग्रेज स्त्री-पुरुषों का स्नेह मुझे मिल रहा है और में आधुनिक भौतिक सभ्यताकी बेहिसाब फिर भी मेरे यूरोपीय और अमेरिकी मित्रोंका दायरा बराबर यह भी अहिंसाकी ही विजय है । निन्दा करता रहता हूँ, बढ़ता ही जा रहा है। अन्तमें, शहरोंमें काम करनेवाले मजदूरवर्गकी बात ले लें। इसके विषयमें कोई गलतफहमी नहीं रह जानी चाहिए। मैं संगठनका विरोधी नहीं, मैं मजदूरोंके संगठनके विरुद्ध नहीं हूँ, मगर में इसे भी हर कामकी तरह हिन्दुस्तानी ढंगपर, या आप चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि अपने ढंगपर करना चाहता हूँ। और में ऐसा कर भी रहा हूँ । हिन्दुस्तानी मजदूर इसे स्वभावसे ही जानता है। में पूँजीपतियोंको मजदूरोंका शत्रु नहीं मानता। मेरा विचार है कि वे मजदूरोंके साथ हिल-मिलकर चल जरूर सकते हैं। दक्षिण आफ्रिका, चम्पारन या अहमदाबादमें मैंने मजदूरोंका जो संगठन किया था, वह पूँजीपतियोंके प्रति किसी वैरभावसे नहीं किया था। हर मामलेमें जहाँ और जितना विरोध करना जरूरी समझा गया, पूरी सफलतासे किया गया। मेरा आदर्श है धनका बराबर बँटवारा, परन्तु जहाँतक में समझ सकता हूँ यह होनेवाली बात नहीं है। इसलिए मैं घनके न्यायपूर्ण समुचित बँटवारेका प्रयत्न करता हूँ । इस आदर्श स्थितिको मैं खद्दरके जरिये प्राप्त करनेकी कोशिश करता हूँ। और चूंकि इस उद्देश्यकी पूर्तिसे अवश्य ही इंग्लैंड द्वारा हिन्दुस्तानकी शोषण-नीति निष्प्राण हो जायेगी, इसलिए खद्दरके प्रचारका यह भी प्रयोजन है कि हिन्दुस्तान और इंग्लैंडके सम्बन्ध निस्वार्थ हो जायें। इसलिए, इस अर्थ में खद्दर स्वराज्यकी प्राप्तिमें सहायक माना जा सकता है । महात्मा' सम्बोधनको तो मुझे उसके हालपर ही छोड़ देना होगा। असहयोगी होते हुए भी में खुशीसे किसी ऐसे कानूनका समर्थन करूँगा, जिससे मुझे महात्मा कहना, या मेरे पैर छूना जुर्म करार दिया जा सके। जहाँ में आप ही वह कानून चला सकता हूँ, यानी आश्रम में वहाँ यह जुर्म ही है । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १७-३-१९२७ Gandhi Heritage Portal