१६८. भाषण : गुरुकुल काँगड़ीके दीक्षान्त समारोहमें १९ मार्च, १९२७ आज तो जी चाहता है कि साधु वास्वाणीकी तरह में भी आपको प्रणाम करके बैठ जाऊँ । पर मनुष्य दूसरेकी हर बातका अनुकरण नहीं कर सकता। फिर अनुकरण भी स्वाभाविक होना चाहिए। इसीलिए मुझे आपसे जो कहना है वह कहता हूँ । । स्वामीजीकी' मृत्यु हुई ही नहीं है। वह तो तब होगी जब हम उनकी सच्ची देहको नष्ट कर डालें। सच तो यह है कि हमारे प्रयत्नोंसे भी उनकी देहका नाश नहीं हो सकता। जबतक गुरुकुल कायम है, जबतक एक भी स्नातक गुरुकुलकी सेवा कर रहा है, तबतक स्वामीजी जीवित ही हैं। स्वामीजीके शरीरका अन्त तो किसी दिन होता ही। पर गुरुकुल स्वामीजीकी सर्वश्रेष्ठ कृति है। उन्होंने अपनी सारी शक्ति इस काममें लगा दी थी। इस गुरुकुलकी स्थापनाके लिए उन्होंने सर्वाधिक तपश्चर्या की । आपने सत्यकी प्रतिज्ञा ली है। यदि आप इस प्रतिज्ञाका पालन करें तो संसारमें कोई शक्ति ऐसी नहीं है जो गुरुकुलको मिटा सके । - यदि हम इस गुरुकुलको चिरस्थायी बनाना चाहते हैं तो आवश्यकता इस बातकी है कि हमने स्वामीजीके जीवनमें जिस वीरता, जिस ब्रह्मचर्य, जिस संकल्प और जिस क्षमाशीलताके दर्शन किये उनका विकास हम अपने जीवनमें भी करें। ब्रह्मचर्यका पालन तथा वीर्यका संचय यही वीरताके लक्षण हैं। इनके द्वारा आप धर्म और देशकी पूरी-पूरी रक्षा कर सकते हैं। मैं जानता हूँ कि यह कार्य कठिन है। मेरे पास आपके यहाँसे बहुतसे विद्यार्थियोंके पत्र आते हैं। कोई मेरी स्तुति करता है; कोई गाली देता है । स्तुतिका तो कुछ उपयोग ही नहीं है । उसका मुझपर कोई असर नहीं होता। परन्तु जब विद्यार्थी चिढ़कर गाली देते हैं तब मुझे उनके विषयमें चिन्ता होती है। क्योंकि क्रोधसे वीर्यका नाश होता है। स्वामीजीके सामने मैंने ब्रह्मचर्यकी अपनी व्याख्या रखी थी और वे मुझसे सहमत थे। किसी स्त्रीका वासनायुक्त स्पर्श न करें, ब्रह्मचर्यका अर्थ इतना ही नहीं है; यह तो ब्रह्मचर्यका केवल आरम्भ है। परन्तु क्षमाकी पराकाष्ठा ब्रह्मचर्यका लक्षण है। पिछले वर्ष जब स्वामीजी टंकारासे लौटते हुए मुझे मिलने आये थे उस समय उन्होंने मुझसे कहा था कि हिन्दू धर्मकी रक्षा नीतिसे ही शक्य है। यदि आप वैदिक आचार और विचारकी रक्षा करना चाहते हैं तो आपको यह बात याद रखनी चाहिए कि आपको ढेरों रुपया मिल सकता है, पर यदि यहाँ नीति और ब्रह्मचर्यका आधार न रहा तो आपका यह गुरुकुल मिट्टीमें मिल जायेगा। यह भूमि तो जड़ है - इसकी आत्मा आप लोग हैं। यदि १. स्वामी श्रद्धानन्द । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२०
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