१७१. भाषण : हरिद्वारकी राष्ट्रीय शिक्षा परिषद में' २० मार्च, १९२७ संस्कृतका अध्ययन करना प्रत्येक भारतीय विद्यार्थीका कर्त्तव्य है । हिन्दुओंका तो है ही, मुसलमानोंका भी है। क्योंकि आखिर उनके पूर्वज भी राम और कृष्ण ही थे। और अपने इन पूर्वजोंको जाननेके लिए उन्हें संस्कृत सीखनी चाहिए। किन्तु मुसलमानोंके साथ सम्बन्ध बनाये रखनेके लिए उनकी भाषा जानना हिन्दुओंका भी कर्त्तव्य है । आज हम एक-दूसरेकी भाषासे दूर भागते हैं, क्योंकि हमारी बुद्धि नष्ट हो गई है। जो संस्था एक-दूसरेके प्रति मनमें द्वेष और भय रखनेकी शिक्षा दे, निश्चित मानिये कि वह राष्ट्रीय संस्था कदापि नहीं है । गांधीजीने कहा कि राष्ट्रीय संस्थाओंको हिन्दू-मुस्लिम एकताके संदेशवाहक तैयार करने चाहिए। जो संस्थाएँ धर्मान्ध, कट्टर हिन्दू या मुसलमान तैयार करती वे नष्ट कर देने योग्य हैं। शैक्षणिक संस्थाओंका उद्देश्य व्यक्तियोंको धर्मान्ध बनाना नहीं है। मुझे विश्वास है कि निराशाका कोई कारण नहीं है और अब भी यदि आत्मावलम्बी और आत्मत्यागी शिक्षक मिल सकें तो हमारा उद्देश्य सफल हो सकता है। [ गुजरातीसे ] नवजीवन, २७-३-१९२७ श्री चन्द त्यागी, १७२. पर्ची : चन्द त्यागीको मौनवार, २१ मार्च, १९२७ आपके साथ में रात्रीको बातें करना चाहता था परंतु आप नहीं थे । दस बजने पर मैंने मौन ले लिया । आपको क्या इच्छा है? यदि आप यहां निश्चित है और शांत है तो जिन चींजोको आप मानते है उसका प्रचार करे और उस द्वारा देशकी सेवा करे । आप जब दिल चाहे आश्रममें जा सकते हो इस समय मेरा तो वहाँ रहना नहीं होता है । इसलिये में नहि जानता आप वहां जाना चाहिगें या नहि । १. गांधीजीने यह भाषण गुरुकुल कांगड़ीके तत्वावधानमें हुई परिषद के अध्यक्षपदसे किया था। २. यह अमुच्छेद लीडर, २३-३-१९२७ से लिया गया है । ३. साधन-सूत्रके अनुसार । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२२३
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